अस्पतालों और मंदिरों से होते सब-वे मेंटेनेंस तक क्यों पहुंच गया महावीर मंदिर न्यास का कामकाज?

पटना का मशहूर महावीर मंदिर जो अब तक अपनी कमाई के पैसों से अस्पताल खोलता रहा था, अब एक मल्टी मॉडल सब-वे का मेंटेनेंस करेगा. पटना जंक्शन और जीपीओ गोलंबर के बीच यात्रियों को स्टेशन लाने, ले जाने के लिए बने इस सब-वे का मेंटेनेंस सरकार के लिए लंबे समय से चुनौती रहा है. पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने इसके मेंटेनेंस के लिए 10 अगस्त, 2026 को एक टेंडर भी निकाला था, जिस टेंडर को 16 सितंबर, 2026 को खुलना था. मगर अब यह खबर आई है कि इस सब-वे के मेंटेनेंस में हर माह खर्च होने वाली आठ लाख की राशि का वहन पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड और महावीर मंदिर न्यास मिलकर करेंगे और प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक आधा-आधा खर्च उठायेंगे.
इस तरह यह तय होने पर कि महावीर मंदिर न्यास चार लाख रुपये महीने का खर्च उठायेगा, सब-वे के मेंटेनेंस में मंदिर न्यास साल भर में 48 लाख रुपये खर्च करेगा. मंदिर की साल भर की आय 31 करोड़ के लगभग आती है, जिसमें वह 3 करोड़ मंदिर के प्रबंधन पर खर्च करता है और करीब 28 करोड़ रुपये की बचत रहती थी. इसी मंदिर की आय और संसाधनों से मंदिर ने महावीर आरोग्य संस्थान, महावीर कैंसर संस्थान और महावीर वात्सल्य अस्पताल जैसे अस्पताल खोले, बाद में विराट रामायण मंदिर के निर्माण का काम शुरू किया, राम मंदिर के निर्माण के लिए 10 करोड़ की राशि देने की घोषणा की और कई धार्मिक और लोक कल्याणकारी कार्य किये.

मगर एक मल्टी मॉडल सब-वे का मेंटेनेंस उसके लोक कल्याणकारी कार्य या गरीब कल्याण के ढांचे में फिट बैठता नजर नहीं आता. हालांकि हमसे बातचीत में मंदिर न्यास के वर्तमान सचिव सायन कुणाल कहते हैं, “बदले में हमें सब-वे में कुछ दुकानें मिलेंगी, जहां हम प्रसाद सामग्री और फूल मालायें वगैरह बेचेंगे. इसके अलावा भीड़-भाड़ वाले दिन वह जगह श्रद्धालुओं के खड़े होने में इस्तेमाल हो सकेगी.” सब-वे में करीब छह दुकानें बनकर आवंटित होनी हैं. कुछ मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि इन दुकानों के आवंटन का जिम्मा मंदिर के पास होगा. हालांकि जब बिहार क्रॉनिकल ने सायन कुणाल से इस बारे में पूछा कि क्या ये दुकानें मुफ्त में मिलेंगी, तो उन्होंने कहा, “अभी यह तय नहीं हुआ है, मगर ऐसा लगता है कि वह इन चार लाख रुपयों के बदले ही होगा.” हालांकि एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक दुकानों से होने वाली आय पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड के खाते में जायेगी.
क्या यह सब आचार्य किशोर कुणाल के नाम की वजह से हुआ?
इसके साथ एक और तथ्य ध्यान देने योग्य है कि इस मल्टी मॉडल सब-वे का नाम महावीर मंदिर न्यास में सबसे लंबे अरसे तक सचिव रहने वाले आचार्य किशोर कुणाल के नाम पर रखा जायेगा, जो सायन कुणाल के पिता हैं. यह इसी हफ्ते हुए बिहार सरकार के कैबिनेट में स्वीकृत हुआ है. क्या मंदिर की तरफ से यह प्रबंधन इसी नामकरण के ऐवज में किया जा रहा है? इस सवाल के जवाब में सायन कुणाल कहते हैं, “दोनों अलग-अलग बातें हैं.” फिलहाल ऐसा कोई दस्तावेज सामने नहीं आया है जिससे नामकरण और मंदिर न्यास के चार लाख रुपये महीने के योगदान के बीच किसी संबंध की पुष्टि होती हो. मगर यह संयोग भी है और इस संयोग और सब-वे के मेंटेनेंस के मंदिर के नये काम के बीच कुछ कड़ियां होने की संभावना पर सवाल जरूर उठता है.
पटना जंक्शन से सटे इस महावीर मंदिर का इतिहास गौरवमय रहा है. ऐसा कहा जाता है कि रामनंदी संप्रदाय का यह मंदिर लगभग तीन सौ साल पुराना है और एक समय इसके स्वामित्व को लेकर विवाद हुआ था. 1930 के दशक में रामनंदी मठ और मंदिर के तत्कालीन महंत के बीच मुकदमा चला था. जिसमें 1948 में इसे सार्वजनिक मंदिर घोषित किया गया, मगर इसके बावजूद इस मंदिर की अव्यवस्था का अंत नहीं हुआ. यह अतिक्रमण और दूसरे विवादों की वजह से चर्चा में रहा.
किशोर कुणाल ने की थी प्रगतिशील परंपराओं की शुरुआत
ऐसे में 1983-84 के बीच जब किशोर कुणाल पटना के एसपी थे, उन्होंने इसे अतिक्रमण मुक्त कराने में भूमिका निभायी और फिर एक नया ट्रस्ट बना, ताकि इस मंदिर का फिर से निर्माण कराया जा सके. इस ट्रस्ट में किशोर कुणाल को सचिव बनाया गया और उसी साल मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ. मंदिर की अपनी वेबसाइट के मुताबिक इसका पुनर्निर्माण 1983 से 1985 के बीच हुआ.
मगर इसकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि एक तरफ इस मंदिर ने दलित पुजारी की नियुक्ति की, वहीं दूसरी तरफ मंदिर की आय से अस्पतालों के खोलने की शुरुआत की. इसकी शुरुआत एक जनवरी, 1989 महावीर आरोग्य संस्थान के खोले जाने से हुई. इसके बाद मंदिर की कमाई से महावीर कैंसर संस्थान अस्तित्व में आया, जिसका उद्घाटन 12 दिसंबर 1998 को हुआ. फिर बच्चों के लिए महावीर वात्सल्य अस्पताल का उद्घाटन 30 अप्रैल 2006 को हुआ. इसके साथ महावीर नेत्रालय और महावीर हार्ट अस्पताल समेत स्वास्थ्य संस्थानों का विस्तार भी इसी मॉडल का हिस्सा रहा. किसी एक मंदिर की कमाई से इतने अस्पतालों का खुलना काफी महत्वपूर्ण माना गया और इसे प्रगतिशील कदम के तौर पर देखा गया.

आज भी मंदिर की कमाई का एक हिस्सा इन अस्पतालों में भर्ती गरीब मरीज के इलाज में खर्च होता है. इस मंदिर का सालाना बजट हर साल मीडिया के सामने रखे जाने की भी परंपरा रही है. साल 2023-24 के लिए पारित 331 करोड़ रुपये के बजट में महावीर मंदिर की अपनी अनुमानित आय 31 करोड़ रुपये बतायी गयी थी और खर्च तीन करोड़ रुपये था. महावीर कैंसर संस्थान की आय 149.76 करोड़ और खर्च 151.16 करोड़ रुपये, आरोग्य संस्थान व नेत्रालय की संयुक्त आय 24 करोड़ और खर्च 22.98 करोड़ तथा वात्सल्य अस्पताल की आय 33.15 करोड़ और खर्च 33.33 करोड़ रुपये अनुमानित था. घाटे में चलने वाले अस्पतालों की भरपाई महावीर मंदिर न्यास द्वारा किए जाने की बात भी इसी विवरण में कही गयी थी. मंदिर से जुड़े एक पूर्व अधिकारी बताते हैं कि बाद के वर्षों में बजट सार्वजनिक होने की परंपरा बंद हो गई.
मंदिर न्यास द्वारा एक पत्रिका धर्मायण का भी प्रकाशन होता था, मगर आचार्य किशोर कुणाल की 2024 में मृत्यु के बाद उस पत्रिका का कोई नया अंक फिलहाल मंदिर की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं दिखता.
अस्पतालों के बाद मंदिरों के निर्माण में बढ़ी रुचि
अपनी शुरुआत अस्पतालों के निर्माण से करने वाले इस मंदिर ट्रस्ट के कामकाज में 2012 के आसपास एक बदलाव जरूर दिखा, जब यह घोषणा की गई कि मंदिर विराट रामायण मंदिर का निर्माण करायेगा और इसमें 80 करोड़ रुपये खर्च होंगे. हालांकि इसका निर्माण 2023 में शुरू हुआ. इसने हाजीपुर और गया में भी मंदिर निर्माण की योजना में हाथ रखा. राम मंदिर निर्माण में दस करोड़ की सहायता की घोषणा की. पुनौरा धाम के मंदिर में भी सहयोग किया. 2026 में विराट रामायण मंदिर में धूमधाम से 33 फीट ऊंचे और 210 टन वजनी शिवलिंग की स्थापना भी मंदिर न्यास के द्वारा कराया गया. इसमें सायण कुणाल ने रुचि ली और इसे भव्य और कुछ हद तक राजनीतिक कार्यक्रम बनाने की भी कोशिश की.
अब इस मंदिर के सोशल मीडिया पेज पर अस्पतालों की सूचनाएं कम और धर्म से जुड़े कार्यों की सूचना अधिक है. दलित पुजारी के मामले में भी बाद के वर्षों में विवाद हुआ.
मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के लिए पैसे खर्च करने का मंदिर न्यास का रुझान तब शुरू हुआ, जब मंदिर के सचिव किशोर कुणाल अयोध्या में पोस्टेड थे और उनकी रुचि राम मंदिर के मामले में बढ़ी. उन्होंने राम मंदिर के मुकदमे में अदालत को अपनी तरफ से तथ्य भी उपलब्ध कराये. कभी दलित देवो भवः किताब लिखने वाले किशोर कुणाल की 2016 में अयोध्या रिविजिटेड नाम से किताब भी आई, जिसमें अयोध्या के विवादित स्थल पर राम मंदिर होने के पक्ष में तथ्य और तर्क हैं. उनके इस झुकाव का असर महावीर मंदिर न्यास के काम-काज पर भी पड़ता दिखा.

एक तरह से ऐसा लगता है कि अस्पतालों से अपनी शुरुआत करने वाला महावीर मंदिर ट्रस्ट पहले धार्मिक कार्यों की तरफ झुका और अब एक नये तरह के काम में एक सब-वे के मेंटेनेंस के काम में हाथ डाल रहा है, जिसका उसे अनुभव नहीं है.
क्या सायण की राजनीति में रुचि है वजह?
इसकी वजह यह कही जा रही है कि एक जमाने में प्रगतिशील हिंदुत्व विचार को मानने वाले किशोर कुणाल की रुचि तो राजनीति में नहीं थी. ऐसी जानकारी उनकी जीवनी में उपलब्ध है. मगर उनके पुत्र सायण कुणाल की रुचि राजनीति में बताई जाती है. ऐसी चर्चाएं कई बार मीडिया में आती है कि उनके ससुर और बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी उनके लिए चुनाव का टिकट हासिल करने की कोशिश करते रहे हैं. उनकी पत्नी सांभवी चौधरी खुद समस्तीपुर की सांसद है.
हालांकि सायण कुणाल कहते हैं, “हमारा अस्पतालों के निर्माण का अभियान अभी भी जारी है. हम बच्चों का एक कैंसर अस्पताल और एक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल भी बना रहे हैं.” 12 दिसंबर 2024 को महावीर बाल कैंसर अस्पताल का शिलान्यास हुआ. 100 बेड वाले इस अस्पताल की अनुमानित लागत करीब 25 करोड़ रुपये बतायी गयी थी और 18 साल तक के बच्चों का मुफ्त इलाज करने की बात कही गयी थी.
मगर क्या गरीबों की सेवा अब भी मंदिर न्यास की प्राथमिकताओं में है? या वह पहले धर्म-कर्म की तरफ शिफ्ट हुआ अब अपने पहले सचिव के नाम पर संचालित हो रहे मल्टी मॉडल हब के मेंटेनेंस में अपने पैसे लगा रहा है. यह बड़ा सवाल है.