क्यों सूरत का टेक्सटाइल उद्योग “कानून” के बदले “फैमिली बिजनेस” के सिस्टम से चलना चाहता है?

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सूरत में आठ घंटे की शिफ्ट और हफ्ते में एक दिन की छुट्टी के लिए मजदूरों का आंदोलन दरअसल वहां कारोबार के उस अनौपचारिक तरीके से बाहर निकलने की उनकी कसमसाहट है, जिसमें फैक्ट्री मालिक मजदूरों पर उपकार जताते हुए उनसे तय समय से अधिक काम कराना चाहते हैं. जबकि मजदूर चाहते हैं कि मालिक कानून का पालन करते हुए उन्हें छुट्टी, ओवरटाइम, पीएफ, ईएसआईसी जैसी बुनियादी सुविधाएं दें.

अपनी एंब्रायोडरी फैक्ट्री में तेजस एसोसियेशन के पूर्व अध्यक्ष करुणेश रणपरिया

अपनी एंब्रायोडरी फैक्ट्री में तेजस एसोसियेशन के पूर्व अध्यक्ष करुणेश रणपरिया

उस रोज मैं सूरत के एंब्रायोडरी फैक्ट्री के मालिकों के सबसे चर्चित संगठन टेक्सटाइल एब्रायोडरी जॉबवर्क एसोसियेशन ऑफ सूरत(तेजस) के दफ्तर में एंब्रायोडरी कारोबारियों के पक्ष को समझने गया था. यह सूरत के विधाता इंडस्ट्रियल जोन के इलाके में है. वहां तेजस के अध्यक्ष हितेश विकारिया से मेरी लंबी बातचीत हुई. पूरी बातचीत के दौरान कई फैक्ट्री मालिक आ रहे थे और वे एसोसियेशन में अपना रजिस्ट्रेशन करा रहे थे. हितेश विकारिया ने कहा कि सूरत में 40 हजार के करीब एंब्रायोडरी यूनिट निबंधित हैं. उनमें से 11 हजार हमारे मेंबर बन चुके हैं.

एसोसियेशन का दफ्तर किसी कारपोरेट ऑफिस जैसा लग रहा था. वहां हर तरह की सुविधा थी. अंदर केबिन में पूर्व अध्यक्ष करुणेश रणपरिया बैठे थे. वे नये सदस्यों के साथ बातचीत कर रहे थे. इस बीच मेरी बातचीत हितेश विकारिया से होने लगी.

वे कहने लगे, “देखिये, पिछले 26-27 साल से सूरत में एंब्रायोडरी मशीन का काम हो रहा है. यहां शुरू से यही सिस्टम चल रहा है. वे 12 घंटे रोज के हिसाब से बारहों महीने काम करते हैं. फिर एक बार त्योहारों में लंबी छुट्टी पर जाते हैं. 95 परसेंट कारीगर अपनी मर्जी से 12 घंटे काम करके 30,000 से 35,000 रुपये तक कमा रहे हैं. यह उनको सूट भी करता है. मगर हाल के दिनों में यूनियन लीडरों ने इन्हें भड़काना शुरू कर दिया है. इससे माहौल भी खराब हो रहा है और काम का हर्जा भी.”

“मगर यह तो सरकार का नियम है. एक जुलाई, 2026 से लागू होने वाले केंद्र सरकार के चार लेबर कोड के चौथे हिस्से में ही प्रावधान है कि आप किसी मजदूर से दिन में आठ घंटे और हफ्ते में 48 घंटे से अधिक काम नहीं करा सकते. इसी जानकारी तो आपलोगों को श्रम विभाग ने दी होगी. यूनियन लीडर और आंदोलनकारी मजदूर तो बस इसी को लागू कराने की मांग कर रहे हैं.” मेरे इस सवाल का जवाब थोड़ी देर बाद अपनी मीटिंग से फ्री हुए करुणेश रणपरिया ने दिया.

वे कहने लगे, “हम इसको लागू कराने के लिये तैयार हैं. अगर मजदूर नियम से चलना चाहते हैं तो हम भी नियम से चलेंगे. हमारा नियम है कि हम फिर नये तरीके से मजदूरी तय करेंगे. वे 26 दिन काम करेंगे तो उन्हें 522 रुपये रोजाना(कुशल मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी) की दर से 26 दिन की मजदूरी मिलेगी. उनके काम के दौरान जो माल खराब होगा, उसका उन्हें आधा हर्जाना देना होगा और वे काम के दौरान फैक्ट्री के अंदर मोबाइल लेकर नहीं जा सकेंगे. उन्हें मोबाइल बाहर जमा कराना होगा. अगर वे राजी हैं तो हम दीवाली के बाद इसे लागू करा लेंगे.”

“अगर वे राजी हो जायेंगे तो आप करा लेंगे?”

इसके जवाब में करुणेश कहते हैं, “राजी होएंगे ही नहीं. आप देखियेगा. पुराना सिस्टम ही बेहतर है. वही चलेगा. इस सिस्टम में हम उनके रहने का भी इंतजाम कर देते हैं. जब जरूरत होती है, एडवांस देते हैं और घर जाने की लंबी छुट्टी देते हैं. किसी के साथ कोई दिक्कत होती है, तो मदद करते हैं. सूरत में मालिक और कारोबार का रिश्ता परिवार जैसा है. यहां ऐसे ही चलता है.”

दिलचस्प है कि नौ और दस अक्तूबर को सूरत में प्रवास कर रहे केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह से जब पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने कुछ ऐसा ही जवाब दिया. उन्होंने कहा, “मालिक और मजदूर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. इस समस्या को परिवार की तरह सुलझाएं. कुछ राजनीतिक तत्व सूरत के माहौल को खराब करने की कोशिश कर रहे हैं.”

सूरत के एंब्रायोडरी यूनिट में तैयार लहंगा, साड़ी और सूट की पूरे देश में मांग होती है, यहां के बांबे मार्केट में बिक रहा लहंगा

बिना औपचारिक खाता-बही के 20-25 लाख मजदूरों वाला उद्योग

सूरत शहर जो टेक्सटाइल और हीरा कटिंग उद्योग का देश का सबसे बड़ा हब माना जाता है. जहां के तकरीबन 14 औद्योगिक परिसरों में लगभग 22 से 25 लाख मजदूर काम करते हैं. हालांकि यह आंकड़ा अनौपचारिक है. जन्मभूमि भारत मजदूर यूनियन के अध्यक्ष अजय दुबे कहते हैं, “सूरत की मात्र 20 फीसदी (बड़ी और लीगल) कंपनियों में ही श्रम कानूनों का पालन होता है. बाकी 80 फीसदी औद्योगिक इकाइयों में मजदूरों को कोई संवैधानिक अधिकार नहीं मिलता. न उनका पीएफ कटता है और न ही ईएसआईसी (एम्पलाईज स्टेट इंश्योरेंस कारपोरेशन) में उनका नाम दर्ज है. यहां तक कि मजदूरों को जॉइनिंग लेटर, हाजिरी कार्ड, पगार स्लिप, ग्रेच्युटी, बोनस और ओवरटाइम जैसी बुनियादी कानूनी सुविधाएं भी नहीं दी जातीं.”

अजय दुबे की बातों में काफी हद तक सच्चाई नजर आती है, क्योंकि ईएसआईसी ऑफिस से जब हमने संपर्क किया तो पता चला कि 31 मार्च, 2026 तक पूरे सूरत रीजन में सिर्फ 4,85,580 कर्मी ही निबंधित हैं. वहीं पीएफ ऑफिस से मिली जानकारी के मुताबिक सूरत क्षेत्र में 7770 कंपनियां निबंधित हैं, जिनमें 4,43,205 कर्मियों का पीएफ अंशदान जमा होता है. जबकि लेबर ऑफिस से मिली जानकारी के मुताबिक सूरत में सिर्फ एंब्रायोडरी यूनिट 40 हजार से अधिक हैं, जो निबंधित हैं. इनके अलावा कपड़ों की पावरलूम मिलें, डाइंग और प्रिंटिग की इकाईयां, हीरा तराशने के कारखाने और पेट्रोकेमिकल कारखानों की बड़ी संख्या है. दिक्कत यह है कि इतने बड़े औद्योगिक क्षेत्र में कितने मजदूर काम करते हैं, सरकार के पास भी इसका कोई आंकड़ा नहीं है. यूनियनों के अनुमान के आधार पर इसकी संख्या बताई जाती है.

ये आंकड़े सूरत के उस विरोधाभास की तरफ इशारा करते हैं, जिसमें कारोबार और मजदूरों की संख्या तो विशाल होती जा रही है, मगर कारोबारी सेठ-मजदूर के पारंपरिक तरीकों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं हैं.

सूरत के मजदूर संगठनों पर काम करने वाले अध्येता और सेंटर फॉर सोशल साइंसेज के पूर्व प्रोफेसर किरण देसाई कहते हैं, “यहां का अभी का सिस्टम पेट्रोनेज, पैट्रियार्की और एक्सप्लाइटेशन का है. तुम हमारे यहां 12 घंटे काम करो, घर जाओगे तो एडवांस दूंगा, एक्सीडेंट हो गया तो मदद करूंगा. रहने की जगह दूंगा. तुम मेरा ध्यान रखो, मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा. इसी बात को मंत्री गिरिराज सिंह भी तो कह रहे हैं. मालिक मजदूरों के प्रति कृपा का भाव जतायेंगे, मगर कभी सिस्टम में नहीं आयेंगे. जबकि लेबर कानून कहता है कि मजदूरों को अधिकार दीजिये, उन पर अहसान मत जताइये. आठ घंटे काम कराइये, 12 घंटे करायेंगे तो ओवरटाइम दीजिये.”

वे कहते हैं, “इसकी एक वजह यह भी है कि यहां मजदूरों की संख्या का कोई आकलन नहीं है. सब फेसलेस लेबर हैं. अदृश्य हैं. यूपी-बिहार, ओड़िशा, एमपी से आते हैं. इनका नंबर न लेबर ऑफिस के पास है, न नगरपालिका के पास, न मालिकों के पास, न लेबर यूनियन के पास. किस कंपनी में कितने मजदूर हैं, यह पता नहीं. लेबर लॉ फिर लागू कैसे हो. इसकी शुरुआत को ज्वाइनिंग और अटेंडेंस से होता है. इतना भी कोई करने के लिये तैयार नहीं. यहां कारखानों में तकनीक तो एडवांस है, मगर वे सिस्टम एडवांस नहीं है.”

लेबर कोड लागू होने के बाद भी यहां बारह घंटे काम करने वाला मजदूर चाहिए

जाति और खानदान के सहारे विकसित हुए यहां उद्योग

ऐसा क्यों हुआ? सूरत में उद्योगों में औपचारिक व्यवस्था के बदले पारिवारिक व्यवस्था ही क्यों आज तक बनी रही? जानकार इसकी दो वजहें बताते हैं. पहली यह कि बंबई(मुंबई) और अहमदाबाद में यूनियनों की हड़ताल की वजह से वहां का कपड़ों का कारोबार मंदा पड़ा, उसी दौरान सूरत में टेक्सटाइल उद्योग विकसित हुआ. इसके विकसित होने के पीछे यहां श्रम कानूनों का कमजोर होना और प्रवासी मजदूरों की वजह से यूनियनों का न बन पाना था. दूसरा सूरत के कारोबार के बड़े हिस्से में जातीय और सामुदायिक व्यवस्था काम करती रही. खासकर टेक्सटाइल उद्योग की शुरुआत पारंपरिक तरीके से हुई.

सूरत शहर के इतिहास पर विस्तृत काम करने वाले सेंटर ऑफ सोशल साइंसेज के प्रोफेसर सदन झा बताते हैं, “यहां मुख्यतः चार जातियां प्रभावी रही हैं. इन्हें ही सूरती कहा जाता है. ये हैं, कनबी (पाटीदार), खत्री, गोला(राणा) और घांची(मोदी). इनमें कनबी कुलीन लोग थे, इन्हीं के पास जमीन और पूंजी होती थी. खत्री पहले बुनकरों का काम करते थे, फिर मास्टर वीबर हुए और फिर इन्होंने अपने घरों में ही पावरलूम स्थापित किया. जहां इनके परिवार और जाति के लोग काम करते थे. गोला जिन्हें राणा भी कहते हैं, वे सोना और चांदी के तार बनाकर जरी का काम करते थे, जो मशीन आने के बाद एंब्रायोडरी के काम में बदला. घांची मुख्यतः दुकानदार थे.”

सदन झा के मुताबिक तब जो खत्री और गोला जाति थी, वह आगे चलकर टेक्सटाइल और एंब्रायोडरी के कारोबार में आई. पहले ये अपने घरों के निचले तलों में ही काम करते थे, और इनके स्टाफ भी इनकी जाति के गरीब लोग ही हुआ करते थे. इसलिए फैमिली बिजनेस के सिस्टम की इनको आदत रही. अस्सी और नब्बे के दशक में जब ध्वनि प्रदूषण और दूसरी वजहों से बेगमपुरा और सलाबतपुरा जैसे इलाकों से कारखानों को खाली करने कहा गया तो ये शहर के परिधि के बाहर गये. उसके बाद कारखाने तो बड़े हुए मगर सिस्टम वही पुराना रह गया.

सदन झा बताते हैं कि सूरत में हीरा तराशने के कारोबार पर लगभग पूरी तरह सौराष्ट्र के पटेल का कब्जा है. वे 1960 के दशक में इन कारखानों में मजदूर बनकर आये थे. अब मालिक भी वही हैं और मजदूर भी. इनमें भी एक ही इलाके और अमूमन एक ही जाति के लोग हैं.

सूरत में प्रवासी मजदूरों का आना, सौराष्ट्र के पटेलों, महाराष्ट्र के खानदेश इलाके के लोगों के जरिये शुरू हुआ. हालांकि यह उस वक्त एक ही राज्य था. दूर दराज से आने वाले पहले प्रवासी ओड़िशा के लोग थे, जो माली बनकर आये थे, बाद में पावरलूम में काम करने लगे. फिर यूपी और बिहार के पारंपरिक बुनकरों के इलाके जैसे बनारस और भागलपुर से मजदूर आने लगे. फिर डाई और प्रिंटिंग के लिए मजदूर आने लगे. इनका आना नब्बे के दशक में शुरू हुआ.

प्रवासी मजदूर शुरुआती दिनों में अकेले आते थे, उनका परिवार गांव में होता था. इसलिए उन्हें भी काम के घंटों की फिक्र नहीं होती थी. ज्यादा से ज्यादा कमाई कर घर ले जाना उनकी प्राथमिकता हुआ करती थी. इसलिए पुराना सिस्टम चलता रहा.

मगर बाद के दिनों में जब मजदूर अपने परिवार को साथ लाने लगे और औद्योगिक परिसरों के आसपास उनकी बस्तियां बसने लगीं तो उन्हें भी छुट्टी और काम के घंटों का सवाल मथने लगा. इसलिए आठ घंटे की शिफ्ट और हफ्ते में एक दिन की छुट्टी का मुद्दा सूरत के मजदूरों के लिए बड़ा सवाल बन रहा है.

सूरत का 18वीं सदी का सोने के जरी का काम, जिसे वहां के किला म्यूजियम में प्रदर्शित किया गया है.

अजय दुबे कहते हैं, “भले ही नये लेबर कोड में आज आठ घंटे की शिफ्ट की बात कही जा रही है. मगर हमलोग 2015 से इसके लिये आंदोलन कर रहे हैं. हमने 2015, 2018 और 2022 में भी ऐसे आंदोलन किये हैं. यह आंदोलन सभी मजदूरों के लिए है, लेकिन इसमें सबसे अधिक सक्रिय भागीदारी एंब्रॉयडरी (कढ़ाई) वर्कर्स की है, क्योंकि वे ज्यादा सजग हैं.”

एंब्रायोडरी मिल के मालिक भले ही कहते हैं कि यह सिस्टम मजदूरों की भी सूट करता है, मगर इस संवाददाता ने अपने सूरत प्रवास के दौरान अलग-अलग इलाकों में 50 से अधिक मजदूरों से बातचीत की. सभी मजदूर हफ्ते में एक दिन की छुट्टी चाहते थे.

18 साल की नौकरी, साप्ताहिक छुट्टी मांगी तो कहा हिसाब कर लो

भोजपुर के संतोष जो सूरत के लक्ष्मीनारायण इंडस्ट्रियल पार्क की एक कंपनी में काम करते हैं. कहते हैं, “हमें न ज्वाइनिंग दिया, न ईएसआई में नाम डाला, न आठ घंटे की ड्यूटी दी, न अटेंडेंस बनता है. हमने सिर्फ एक दिन की हफ्ते में छुट्टी मांगी. ताकि परिवार के साथ समय गुजार सकें. बच्चों को समय दे सकें. कुछ खरीदारी, घूमना फिरना कर सकें. मगर ये लोग उसके लिये भी राजी नहीं हैं. तरह-तरह के बहाने बनाते हैं. सैलरी काटने की बात करते हैं.”

यूपी के श्याम सुंदर कहते हैं, “हम भी इंसान हैं. 12 घंटा और 365 दिन कटाना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसीलिए हमको भी आराम चाहिए थोड़ा, हमारा भी परिवार है… 18 साल से एक ही सेठ के यहां काम कर रहे. उसका दो मशीन से आज 40 मशीन हो गया, हमारी मेहनत से. हमने हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मांग ली तो कहा, जाकर हिसाब कर लो.”

“मगर सेठ तो कहते हैं कि कारीगर 12 घंटे इसलिए काम करता है, जिससे 30-35 हजार की कमाई हो? आठ घंटे काम करेगा तो 14 हजार ही मिलेंगे.”

इस पर भदोही के रामदास कहते हैं, “30-35 हजार की कमाई ऐसे ही थोड़े होती है. एक मशीन पर काम करने वाला आज भी 16 हजार ही कमा रहा है. उसको उतनी ही सैलरी मिलती है. जो दो मशीन एक साथ संभालता है, उसको मालिक 25 से 30 हजार सैलरी देते हैं. आठ घंटे की ड्यूटी होगी तो ठीक है, 15 हजार मिलेंगे. मगर सेठ ज्यादा काम करायेगा तो ओवर टाइम देना होगा, जिसका रेट डबल होगा. तब भी इतना ही कमाई होगी. सिस्टम से चलें तब भी मजदूर का ही फायदा है. मगर फिर वे माल खराब होने का हर्जाना मांगेंगे. इस पर भी हमारा कहना है कि जिस दिन माल खराब हुआ, उसी दिन हमें दिखायें और हर्जाना तय करें.”

“मगर सेठ को कहते हैं कि मालिक और मजदूर परिवार की तरह हैं.”   

एंब्रायोडरी फैक्ट्री के भीतर एक प्रवासी मजदूर

इस मसले पर ओड़िशा से आये मजदूर राजेश साहू कहते हैं, “उनका अपना फैमिली है, हमारा अपना. वे अपने फैमिली का ध्यान रखें, हम अपने फैमिली का. कारखाने में कानून के हिसाब से चलें. फैमिली का सिस्टम घर पर रखें.”

लेबर डिपार्टमेंट कहता है, शिकायत होगी तब तो कार्रवाई करेंगे

इस पूरे मसले पर सूरत के लेबर डिपार्टमेंट की राय जानने के लिए जब मैं वहां के असिस्टेंट लेबर कमिश्नर एसएस दुबे से मिला तो उन्होंने कहा, “लेबर कोड को लागू करने की घोषणा होने पर हमलोगों ने इसकी सूचना सभी कारखाना प्रबंधकों को दे दी थी, इनमें तेजस एसोसियेशन भी शामिल है. उन्हें इन्हें लागू कराना है. मैं सोशल मीडिया पर यह देखता हूं कि लोग लेबर कोड लागू नहीं होने की शिकायत करते हैं, मगर मेरे पास अब तक एक भी औपचारिक शिकायत नहीं आई. लेबर यूनियन वाले मुझसे मिलते हैं, मगर एंब्रायोडरी फैक्ट्री में लेबर कोड लागू नहीं हो रहा, इसकी शिकायत नहीं करते. हमारे पास शिकायत आयेगी तो हम जरूर कार्रवाई करेंगे.”

“3” पर क्यों सूरत का टेक्सटाइल उद्योग “कानून” के बदले “फैमिली बिजनेस” के सिस्टम से चलना चाहता है? के विचार

  1. बहुत अच्छी रिपोर्टिंग की है आमने।मालिक और मजदूर एक परिवार हैं कि बात करना मालिकों का गलत है।यह कहना कि दिहाड़ी मजदूरी देंगे।यह दिहाड़ी वालों के लिए होता है,स्थायी वालों के लिए नहीं।

  2. Report is prepared by actual situation on ground and discussed all party involved.
    After reading it i conclude that it is all have fault system.
    Ignore by labour dept.which depends on complaint not seen any humatarian violation against labour.
    Labour are not united
    Owners have to understand wages and treat labour with dignity.

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