पटना हाई कोर्ट के सामने पहुंचा सवाल, किसे कहा जाए ‘सिनेमा की किताब’
किशोर कुमार की जीवनी को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट बुक ऑन सिनेमा’ दिए जाने को चुनौती, याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में भेदभाव का भी लगाया आरोप. पटना हाई कोर्ट के सामने अब एक दिलचस्प सवाल है—आखिर किसे सिनेमा की किताब कहा जाए?

सिनेमा पर लिखी किताब किसे कहेंगे? यह सिनेमा बनने की कहानी होगी, सिनेमा की समीक्षा की कहानी होगी, सिनेमा के तकनीकी पहलुओं की कहानी होगी या फिर सिनेमा से जुड़े किसी शख्स की जीवनी को भी सिनेमा की किताब माना जाएगा। अब तक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘बेस्ट बुक ऑन सिनेमा’ के लिए जीवनियों को भी पुरस्कार दिया जाता रहा है। मगर अब पटना के एक लेखक अनंत प्रसाद सिन्हा ने पटना हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है और कहा है कि अगर किसी गायक की जीवनी सिनेमा पर लिखी किताब हो सकती है, तो आंबेडकर की जीवनी को क्या हम संविधान पर लिखी किताब कह सकते हैं?
जस्टिस अजीत कुमार की अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएफडीसी), राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की इस श्रेणी के जूरी सदस्यों और किताब के लेखकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होनी है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या इस मामले से ‘बेस्ट बुक ऑन सिनेमा’ पुरस्कार के लिए किताबों के चयन की कसौटी और स्पष्ट हो सकती है।
यह मामला 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट बुक ऑन सिनेमा’ का पुरस्कार पाने वाली किताब ‘किशोर कुमार: द अल्टीमेट बायोग्राफी’ से जुड़ा है। किशोर कुमार की जीवनी अनिरुद्ध भट्टाचार्य और पार्थिव धर ने लिखी है और इसे हार्पर कॉलिन्स ने प्रकाशित किया है। 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में इसे ‘बेस्ट बुक ऑन सिनेमा’ के लिए चुना गया। आधिकारिक पुरस्कार कैटलॉग में इसे किशोर कुमार के बहुआयामी करियर पर 30 वर्षों के शोध से तैयार जीवनी बताया गया है।
याचिकाकर्ता अनंत प्रसाद सिन्हा, जिन्होंने इसी वर्ष अपनी किताब ‘दो गुलफामों की तीसरी कसम’ की प्रविष्टि इस पुरस्कार के लिए भेजी थी, का कहना है कि उनकी किताब फिल्म ‘तीसरी कसम’ के निर्माण की कथा कहती थी, मगर उसे नजरअंदाज करके एक जीवनी को इस श्रेणी में पुरस्कार के लायक समझा गया।
उनका सवाल यह है कि क्या किसी फिल्मी व्यक्तित्व की जीवनी को सिर्फ इसलिए ‘सिनेमा पर किताब’ माना जा सकता है क्योंकि उस व्यक्ति का सिनेमा से गहरा संबंध रहा है? राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की इस श्रेणी का नाम ‘बेस्ट बुक ऑन सिनेमा’ है। ऐसे में चयन के लिए ‘भारतीय सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ पुस्तक’ की कसौटी लागू होनी चाहिए। उनके मुताबिक उनकी अपनी किताब ‘दो गुलफामों की तीसरी कसम’ इस कसौटी को पूरा करती है।
सिन्हा की किताब फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ से 1966 में बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ तक की यात्रा को केंद्र में रखती है। इसमें कहानी, फिल्म के निर्माण और उससे जुड़े लोगों की भूमिका के जरिए साहित्य से सिनेमा में रूपांतरण की प्रक्रिया को देखा गया है।
ऐसे में एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर जूरी के सामने सिनेमा-केंद्रित ऐसी किताब मौजूद थी, जो एक साहित्यिक रचना के फिल्म में बदलने की छह साल की पूरी यात्रा पर केंद्रित थी, तो जूरी ने किशोर कुमार की जीवनी को किस आधार पर चुना? सवाल यह भी है कि जब पुरस्कार के लिए अलग-अलग प्रकृति की किताबें जूरी के सामने हों, तो उनके बीच चयन का आधार क्या हो?
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के आधिकारिक दस्तावेज में किशोर कुमार की किताब को इसलिए पुरस्कृत किया गया कि इसमें उनके गायक, संगीतकार, अभिनेता और फिल्म निर्माता के रूप में विभिन्न पहलुओं को शोध के आधार पर सामने लाया गया है। लेकिन क्या यही मानदंड इस श्रेणी की हर जीवनी पर लागू होगा? यह उन सवालों में से है, जिनका जवाब चयन प्रक्रिया से जुड़े पक्षों को देना होगा।
सिन्हा ने अपनी याचिका में चयन प्रक्रिया को लेकर भेदभाव का आरोप भी लगाया है। उनका कहना है कि उनकी किताब ‘दो गुलफामों की तीसरी कसम’ को उस तरह विचार नहीं किया गया, जिस तरह किशोर कुमार की जीवनी को किया गया।
यह आरोप अभी याचिकाकर्ता का दावा है। हाई कोर्ट ने इस पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और केंद्र की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया है।
इस मामले में अदालत के सामने केवल पुरस्कार पाने वाली किताब की पात्रता का सवाल नहीं है। एक बड़ा सवाल जूरी के निर्णय की कसौटी का भी है। यदि नियम केवल ‘सिनेमा पर किताब’ कहते हैं और इस श्रेणी की कोई अधिक विस्तृत परिभाषा नहीं है, तो जूरी किस आधार पर तय करती है कि कोई जीवनी सिनेमा पर है और कोई दूसरी किताब नहीं?
और यदि एक ही समय में एक ओर किशोर कुमार की विस्तृत जीवनी हो और दूसरी ओर ‘तीसरी कसम’ जैसी फिल्म के बनने की प्रक्रिया पर केंद्रित किताब, तो पुरस्कार के लिए दोनों में से किसे चुना जाएगा, चयन का आधार क्या होगा?
पटना हाई कोर्ट का यह मामला एक पुरस्कार विवाद से आगे जाकर सिनेमा पर लिखे जाने वाले साहित्य की सीमा और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में जूरी के चयन की कसौटी का सवाल बन गया है।