भोला पासवान शास्त्री- तीन छोटी पारियां, तीन बड़े फैसले

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यह भोला बाबू ही थे, जिन्होंने पहली बार बिहार में बुजुर्गों के लिए 20 रुपये पेंशन देने का फैसला लिया था और उन्होंने ही लैंड सीलिंग की अधिकतम सीमा को 8-24 हेक्टेयर से घटाकर लगभग 4-8 हेक्टेयर करने की नीति तय की थी. ये तीनों बड़े फैसले हैं. ये फैसले भोला पासवान शास्त्री की राजनीतिक दृढ़ निश्चय को दर्शाते हैं.

21 सितंबर को भोला पासवान शास्त्री की जयंती थी. बिहार के पहले दलित सीएम भोला पासवान शास्त्री की कहानी जब भी कही जाती है, तो उसमें उनकी इमानदारी और अंतिम संस्कार के वक्त उनके खाते में पैसे होने का जिक्र भर रहता है. मगर जब उन्हें याद किया जाता है, तो उस दौरान उनके काम-काज की चर्चा तक नहीं होती. इसका एक गुनहगार मैं भी हूं, जो 2014 से उनकी कहानी लिख रहा हूं. बहरहाल इस बार मैंने यह समझने की कोशिश की कि एक सादगी भरे, गांधी और आंबेडकर को मानने वाले इस सर्वमान्य नेता के खाते में उपलब्धियां क्या-क्या हैं. तलाशा तो हैरत में पड़ गया.

वे तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने और तीनों कार्यकाल मिलाकर भी करीब 11 महीने ही सत्ता में रहे. लेकिन इसी दौरान उन्होंने तीन बड़े फैसले लिये. पहला मुंगेरीलाल आयोग का गठन जिसने आगे चलकर बिहार में पहली बार पिछड़ों, अतिपिछड़ों, महिलाओं और गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का रास्ता तैयार किया. हम इस आयोग की सिफारिशों को लागू करने वाले कर्पूरी ठाकुर को याद करते हैं, मगर इसका गठन करने वाले भोला पासवान शास्त्री को भूल जाते हैं.

यह भोला बाबू ही थे, जिन्होंने पहली बार बिहार में बुजुर्गों के लिए 20 रुपये पेंशन देने का फैसला लिया था और उन्होंने ही लैंड सीलिंग की अधिकतम सीमा को 8-24 हेक्टेयर से घटाकर लगभग 4-8 हेक्टेयर करने की नीति तय की थी. ये तीनों बड़े फैसले हैं. ये फैसले भोला पासवान शास्त्री की राजनीतिक दृढ़ निश्चय को दर्शाते हैं.

वे पहली बार 22 मार्च 1968 को मुख्यमंत्री बने. 1967 के चुनाव के बाद बिहार में कांग्रेस पहली बार बहुमत से बाहर हुई थी और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो चुका था. बीपी मंडल की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के भीतर टूट हुई और बिनोदानंद झा के नेतृत्व वाले धड़े ने भोला पासवान शास्त्री को आगे किया.

दिलचस्प है कि उन्हें समाजवादी दलों, जनसंघ और कम्युनिस्ट पार्टी तक हर तरह की पार्टियों ने समर्थन दिया था. अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की इस सरकार ने 17 सूत्री साझा कार्यक्रम बनाया, लेकिन अंतर्विरोध इतने गहरे थे कि सरकार 95 दिन में गिर गई.

बहरहाल 1969 में वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने. मगर वह पारी सिर्फ 13 दिन चली. कांग्रेस के विभाजन और विधानसभा में बदलते समीकरणों के बीच वे फिर एक स्वीकार्य चेहरा बने, लेकिन गठबंधन की राजनीति ज्यादा दिनों तक नहीं चली. तीसरी बार 2 जून 1971 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला. यह उनकी सबसे लंबी पारी थी- करीब सात महीने. दिसंबर में उन्होंने हाईकमान की सलाह पर इस्तीफा दिया और विधानसभा भंग होने के बाद जनवरी 1972 तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहे.

ऐसे में सवाल उठता है कि बार-बार उन्हीं को क्यों चुना जाता था? और बार-बार हटा भी दिया जाता था.

शास्त्री ने खुद इसका एक दिलचस्प जवाब दिया था. 28 फरवरी 1978 के एक भाषण में उन्होंने कहा था कि कांग्रेस नेतृत्व को लगता था कि वे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें अपनी इच्छा के अनुसार हटाया जा सकता है. उनकी स्वीकार्यता, लंबा प्रशासनिक अनुभव और अलग-अलग राजनीतिक समूहों के बीच अपेक्षाकृत कम टकराव वाला व्यक्तित्व उन्हें उस दौर में समझौते के उम्मीदवार के रूप में उपयोगी बनाता था.

वे पहले दो कार्यकाल में तो बड़े फैसले ले नहीं पाये, मगर तीसरे कार्यकाल में तीन बड़े फैसले किये, जिनका जिक्र पहले किया जा चुका है. मगर उनकी कार्यशैली का नमूना एक विवादित प्रसंग में भी देखा जा सकता है. 1971 में पूर्णिया के रूपसपुर-चांदवा में भूमि विवाद के बाद हुई हिंसा में एक प्रभावशाली कांग्रेसी नेता और विधानसभा अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण सुधांशु के परिवार का नाम भी मामले में आया. घटना उनके गृह जिले पूर्णिया की थी और सुधांशु से उनके अच्छे संबंध भी थे. मगर शास्त्री ने अपने पुराने संबंधों की परवाह किए बिना गिरफ्तारी का आदेश दिया. इसे उनके प्रशासनिक निष्पक्षता के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है.

मगर शास्त्री की कहानी सिर्फ सीएम के रूप में उनका कार्यकाल नहीं है. वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे और कई बार जेल गए. 1946 में बिहार विधानसभा पहुंचे और 1946 से 1963 तक संसदीय सचिव तथा मंत्री के रूप में राज्य सरकार में रहे. बाद में वे राज्यसभा पहुंचे और 1973 से 1974 तक इंदिरा गांधी की केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे. उनके पास वर्क्स, हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट का दायित्व था. 1977-78 में वे कुछ समय के लिए राज्यसभा में विपक्ष के नेता भी रहे और 1978 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष बनाए गए.

इस दौरान इंदिरा गांधी के साथ उनका राजनीतिक संबंध बेहतर रहा. 1971 में कांग्रेस के विभाजन के बाद वे इंदिरा गांधी के कांग्रेस धड़े के साथ आए और उसी वर्ष तीसरी बार मुख्यमंत्री बने. अगले वर्ष राज्यसभा पहुंचे और फिर केंद्र में मंत्री बने. यानी बिहार की अस्थिर राजनीति से निकलकर वे राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय भूमिका तक पहुंचे.

उनके नाम में लगे ‘शास्त्री’ भी एक कहानी है. उन्होंने काशी विद्यापीठ से संस्कृत में शास्त्री की उपाधि हासिल की थी. यही उपाधि आगे चलकर उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गई. राज्यसभा के आधिकारिक श्रद्धांजलि वक्तव्य में उन्हें सरल जीवन जीने वाला और गांधीवादी विचारों वाला व्यक्ति बताया गया है. उसमें यह भी कहा गया कि अलग-अलग ऊंचे पदों पर पहुंचने के बावजूद उनकी जीवनशैली नहीं बदली.

भोला पासवान शास्त्री के राजनीतिक संस्कारों पर गांधी की गहरी छाप थी. छात्र जीवन में वे खादी और स्वदेशी के प्रचार से जुड़े और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जेल गए. गांधी के साथ उन पर आंबेडकर का भी प्रभाव था. दलित समाज से आने के कारण अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव का अनुभव उन्होंने खुद किया था. इसी वजह से डॉ. आंबेडकर के विचारों ने भी उन्हें प्रभावित किया. उनकी राजनीति में गांधी की सादगी और सामाजिक न्याय की आंबेडकरवादी बेचैनी, दोनों की छाप दिखाई देती है.

मैं पूर्णिया के काझा कोठी के पीछे उनके पैतृक गांव में गया था. उनकी अपनी संतान नहीं हैं. मगर उनके भतीजे उस वक्त तक मनरेगा मजदूरी करते थे. उन्होंने बताया कि भोला बाबू के अंतिम संस्कार और श्राद्ध तक के लिये उनके खाते में पैसे नहीं थे.

ऐसे में उन्हें उनकी निर्विवाद इमानदारी, गांधी और आंबेडकर के विचारों की छाप, कमजोर सरकारों के तीन कार्यकाल के बावजूद बड़े और मजबूत फैसले लेने वाले नेता के तौर पर याद किया जाना चाहिए.

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