गाद प्रबंधन का नया फार्मूला, इलाज के नाम पर नई बीमारी तो नहीं?
रेत खनन का अनुभव हमारे सामने है। नदी की तलहटी से जरूरत से ज्यादा सामग्री निकालने पर गहरे गड्ढे बन जाते हैं। अगर डिसिल्टिंग के नाम पर भी लगातार खुदाई होती रही तो नदी की तलहटी कहीं उथली और कहीं असामान्य रूप से गहरी हो सकती है। इससे नदी के बहाव की गति और दिशा बदल सकती है। तट कटाव बढ़ सकता है और नदी तथा भूजल के बीच का प्राकृतिक संबंध भी प्रभावित हो सकता है। सोन नदी में बड़े पैमाने पर बालू खनन से हुए बदलाव इस खतरे को समझने का एक उदाहरण हैं।

15 सितंबर को बिहार सरकार ने अपनी गाद प्रबंधन नीति को मंजूरी दे दी। केंद्र सरकार की निष्क्रियता के कारण बिहार सरकार को इस दिशा में कुछ न कुछ फैसला करना ही था। इस नीति में सरकार गाद को बेकार मिट्टी नहीं, बल्कि एक संसाधन के रूप में देख रही है। नदियों, बैराजों और जलाशयों से गाद निकालकर उसका इस्तेमाल सड़क, रेल, सिंचाई, बाढ़ सुरक्षा और भवन निर्माण में करने की योजना है।
सुनने में यह अच्छा लगता है। लेकिन असली सवाल यह है कि गाद निकलेगी कैसे, कितनी निकलेगी और इसके पर्यावरणीय असर क्या होंगे? कहीं बाढ़ से निपटने के नाम पर नदियों का नया खनन तो शुरू नहीं हो जाएगा?
बिहार की नदियां हिमालय और उसके तराई इलाके से भारी मात्रा में गाद लेकर आती हैं। बिहार जल संसाधन विभाग के अनुसार अकेली कोसी नदी बराहक्षेत्र में हर साल औसतन करीब 95 मिलियन क्यूबिक मीटर गाद लेकर आती है। मैदान में पहुंचने के बाद नदी की रफ्तार कम होती है और गाद का एक हिस्सा नदी की तलहटी में जमने लगता है।
इससे नदी की पानी ले जाने की क्षमता प्रभावित होती है। नदी में बालू के टीले और टापू बनने लगते हैं और कई बार नदी अपना रास्ता भी बदलती है। विभाग के अनुसार पिछले करीब 250 वर्षों में कोसी लगभग 112 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसक चुकी है।
कोसी पर हुए शोध भी बड़े पैमाने पर गाद के जमाव की पुष्टि करते हैं। आईआईटी कानपुर के राजीव सिन्हा और उनके सहयोगियों के अध्ययन में कोसी के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी मात्रा में तलछट जमा होने की बात सामने आई है। इसका सीधा असर नदी की तलहटी की ऊंचाई और नदी के स्वरूप पर पड़ता है।
ऐसे में जहां गाद असामान्य रूप से जमा हो गई हो, वहां सीमित मात्रा में गाद निकालने से नदी की पानी ले जाने की क्षमता बढ़ सकती है। लेकिन यहां एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है। गाद आना कोई एक बार की घटना नहीं है। हर मानसून में हिमालय से नई गाद आएगी।
आज जिस जगह से गाद निकाली गई, संभव है कुछ साल बाद वहां फिर वही स्थिति पैदा हो जाए।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि गाद निकाली जाए या नहीं। सवाल यह है कि कहां से, कितनी और कितने अंतराल पर गाद निकाली जाए।
दरअसल, गाद प्रबंधन की यह बहस नई नहीं है। फरवरी 2026 में बिहार के जल संसाधन विभाग ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT की ईस्टर्न जोन बेंच में दाखिल काउंटर-अफिडेविट में केंद्र सरकार के साथ हुए पत्राचार और अपनी ओर से चल रही योजनाओं का विवरण दिया था। हलफनामे के साथ केंद्र को भेजे गए पत्र और विभाग की योजनाओं से जुड़े दस्तावेज भी लगाए गए थे।
इसी मामले से जुड़े बाद के दस्तावेजों में गंडक की सहायक छाड़ी नदी का उदाहरण भी सामने आता है। सितंबर 2025 में जल संसाधन विभाग ने गोपालगंज के जिलाधिकारी को NGT के निर्देश का हवाला देते हुए बताया था कि छाड़ी नदी दोनों तरफ करीब 10–20 फुट तक अतिक्रमण का शिकार हो गई है और उसका स्वरूप नहर जैसा हो गया है। विभाग ने अतिक्रमण हटाने के लिए कार्रवाई करने को कहा था।
नई नीति में निकाली गई गाद को निर्माण कार्यों में इस्तेमाल करने की बात कही गई है। यह एक उपयोगी सोच हो सकती है। लेकिन अगर नदी से निकली गाद का बाजार बन गया और बड़े पैमाने पर इसकी मांग पैदा हुई, तो क्या होगा?
रेत खनन का अनुभव हमारे सामने है। नदी की तलहटी से जरूरत से ज्यादा सामग्री निकालने पर गहरे गड्ढे बन जाते हैं। अगर डिसिल्टिंग के नाम पर भी लगातार खुदाई होती रही तो नदी की तलहटी कहीं उथली और कहीं असामान्य रूप से गहरी हो सकती है।
इससे नदी के बहाव की गति और दिशा बदल सकती है। तट कटाव बढ़ सकता है और नदी तथा भूजल के बीच का प्राकृतिक संबंध भी प्रभावित हो सकता है। सोन नदी में बड़े पैमाने पर बालू खनन से हुए बदलाव इस खतरे को समझने का एक उदाहरण हैं।
इसलिए गाद को संसाधन मानने में कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तब शुरू होगी जब संसाधन की मांग नदी के विज्ञान से बड़ी हो जाएगी।
गाद की असली कहानी बिहार से शुरू भी नहीं होती। हिमालय दुनिया की सबसे युवा और तेजी से बदलती पर्वत श्रृंखलाओं में है। भारी मानसूनी बारिश, भूस्खलन और पहाड़ों की ढलानों के कटाव से बड़ी मात्रा में मिट्टी और चट्टानी पदार्थ नदियों में आता है।
कोसी, कमला, बागमती और गंडक जैसी नदियां नेपाल और हिमालयी क्षेत्र से भारी मात्रा में तलछट लेकर बिहार पहुंचती हैं। मैदान में नदी की ढाल कम होने पर इस तलछट का एक हिस्सा नदी में जमा होने लगता है।
इसके बाद इंसानी दखल इस समस्या को और जटिल बना देता है।
तटबंध नदी को एक सीमित गलियारे में बहने के लिए मजबूर करते हैं। बाढ़ के मैदान, चौर और आर्द्रभूमियां सिकुड़ती जाती हैं। प्राकृतिक जलनिकासी के रास्ते बंद होते जाते हैं। नतीजा यह होता है कि पानी के फैलने और निकलने की जगह लगातार कम होती जाती है।
इस पूरी बहस में फरक्का बैराज को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फरक्का ने गंगा के प्राकृतिक प्रवाह और गाद के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को बदला है। विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में बैराज के ऊपर तलछट के जमाव और नदी की बनावट में बदलाव दर्ज किए गए हैं।
केंद्र सरकार भी अतीत में भीमगौड़ा से फरक्का तक गंगा में डिसिल्टिंग के संदर्भ में दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है।
बिहार लंबे समय से फरक्का को राज्य की बाढ़ और गाद की समस्या से जोड़कर देखता रहा है। राज्य का तर्क है कि हिमालय से आने वाली भारी मात्रा में तलछट गंगा में जमा होती है और फरक्का की संरचना तथा उससे जुड़े प्रवाह में बदलाव इस समस्या को और जटिल करते हैं।
लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ फरक्का का नहीं है। सवाल पूरी नदी और पूरे नदी बेसिन को एक साथ देखने का है।
विशेषज्ञों के अनुसार समाधान पूरी नदी की ‘सफाई’ करने में नहीं, बल्कि बेसिन स्तर पर गाद का प्रबंधन करने में है।
पहला काम होना चाहिए—नदियों की वैज्ञानिक मैपिंग। यह पता लगाया जाए कि हर साल कितना सेडीमेंट आ रहा है, कहां जमा हो रहा है और किन जगहों पर उसका जमाव वास्तव में बाढ़ का खतरा बढ़ा रहा है।
दूसरा, सिर्फ उन्हीं जगहों पर सीमित डिसिल्टिंग की जाए जहां उसका वैज्ञानिक आधार हो। कितनी गहराई तक खुदाई होगी और कितनी मात्रा में गाद निकाली जाएगी, इसकी सीमा पहले से तय हो। हर मानसून के बाद नदी की तलहटी का सर्वे भी किया जाए।
तीसरा, निकाली गई गाद की गुणवत्ता की जांच जरूरी है। हर गाद सड़क या भवन निर्माण के लायक नहीं होती। उसमें मिट्टी, जैविक पदार्थ और दूसरे प्रदूषक अलग-अलग मात्रा में हो सकते हैं।
और चौथा, गाद की समस्या के स्रोत पर भी काम करना होगा। हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव कम करना होगा। वेस्टलैंड और बाढ़ के मैदान बचाने होंगे। प्राकृतिक ड्रेनेज चैनलों को फिर से खोलना होगा और नदियों को उनके प्राकृतिक फैलाव के लिए पर्याप्त जगह देनी होगी।
बिहार की नई गाद प्रबंधन नीति एक अवसर है। अगर वैज्ञानिक मैपिंग, सीमित निकासी, पर्यावरणीय निगरानी और पारदर्शी इस्तेमाल के साथ इसे लागू किया गया तो इससे नदी की क्षमता बहाल करने और निर्माण क्षेत्र को उपयोगी सामग्री देने, दोनों में मदद मिल सकती है।
लेकिन अगर गाद को सिर्फ निर्माण सामग्री समझ लिया गया तो खतरा है कि बाढ़ प्रबंधन के नाम पर नदी का नया खनन शुरू हो जाए।
फिर नदी की तलहटी में गहरे गड्ढे बन सकते हैं। बहाव की दिशा और गति बदल सकती है। कुछ जगहों पर तट कटाव बढ़ सकता है। भूजल और नदी के बीच का प्राकृतिक संबंध भी बिगड़ सकता है। और कुछ परिस्थितियों में इससे डूबने और कटाव का खतरा कम होने के बजाय बढ़ सकता है।
इसलिए इस नीति की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि एक साल में कितनी गाद निकाल ली गई।
सवाल यह होना चाहिए कि नदी का प्राकृतिक संतुलन कितना बचा और बाढ़ का खतरा कितना घटा।
गाद को संसाधन बनाना अच्छी बात है।
लेकिन नदी को गाद का गोदाम समझना खतरनाक होगा।
आखिर सवाल यही है—नदी से कितनी गाद निकलेगी, यह बाजार तय करेगा या नदी का विज्ञान?