सिंहवाहिनी देवियों से सड़कों पर लड़ती स्त्रियों तक: शक्ति, सत्ता और बराबरी की यात्रा

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चार हजार साल से सिंहवाहिनी स्त्रियों की यह दुनिया पूजा करती रहीं. मगर देवत्व की छवि में कैद ऐसी जिंदा स्त्रियों की मौजूदगी को लेकर समाज कभी सहज नहीं रहा. मगर आज की स्त्रियां दुर्गा और काली बनकर पूजित होना भी नहीं चाहतीं. वे इंसान बनकर उसी तरह संघर्ष करना चाहती हैं, जैसे पुरुष करते रहे हैं. वे उस सामाजिक बोझ से मुक्त होना चाहती हैं, जो समाज ने एक आदर्श स्त्री के नाम पर उनके सिर पर डाल दिया है.

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पहले मुझे लगता था कि सिर्फ अपने देश में दुर्गा और काली जैसी उन देवियों की पूजा होती है, जो शक्ति का स्वरूप हैं. मगर धीरे-धीरे पता चला कि बहुत पुराने समय से, जब दुनिया में हड़प्पा और मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताएं अस्तित्व में थीं, तब से इंसान ऐसी स्त्रियों को देवी मानकर पूजता रहा है, जो हथियारों से लैस हैं. ऐसी कई देवियां तो सिंह पर सवार भी नजर आती हैं.

आपको हैरत होगी कि लगभग चार हजार साल पुरानी मेसोपोटामिया सभ्यता में इश्तर युद्ध, प्रेम और उर्वरता की देवी के रूप में पूजी जाती थीं. ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित एक प्राचीन बेलनाकार मुहर में वह सिंह पर पैर रखे खड़ी नजर आती हैं. देवी खुद भी हथियारों से लैस हैं.

प्राचीन मिस्र में सेखमेत नाम की देवी पूजी जाती थीं. उनका चेहरा सिंहनी जैसा था. वह युद्ध, विनाशकारी शक्ति और संरक्षण की देवी थीं. ब्रिटिश म्यूजियम में उनकी विशाल प्रतिमा सुरक्षित है. प्राचीन अनातोलिया और यूनानी-रोमन काल में साइबेले नाम की देवी की पूजा होती थी. वह महान माता के रूप में अक्सर सिंह के साथ या सिंहों द्वारा खींचे जा रहे रथ पर सवार दिखाई देती थीं. कुषाण साम्राज्य के कुछ सिक्कों पर पहली सदी में देवी नाना को सिंह पर सवार और त्रिशूल थामे देखा जा सकता है.

दुनिया भर में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं. जरा सोचिये, चार हजार साल से भी अधिक पुराने इतिहास में इंसान शक्ति के लिए स्त्री की उपासना करता रहा है. आम तौर पर पूजा-पाठ जैसे कार्यों को स्त्रियों से जोड़कर देखा जाता है, मगर इन देवियों की आराधना में पुरुषों की भी बड़ी भागीदारी रही है. अपने देश में दुर्गा और काली की पूजा में पुरुष बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. कुछ दशक पहले तक डकैतों के काली की पूजा करके डकैती डालने निकलने के किस्से भी सुनने को मिलते थे.

मेसोपोटामिया की देवी इश्तर

यह मानवीय सभ्यता का अजीब विरोधाभास है. एक तरफ स्त्रियों को शारीरिक रूप से कमतर समझा जाता है, दूसरी तरफ इंसान उनकी आराधना शक्ति और युद्ध की देवी के रूप में करता है. ये देवियां अक्सर सिंह पर सवार नजर आती हैं.

अपने ही देश को देखें. दुर्गा की कथा में देवता अपनी शक्तियां एकत्र कर देवी को अस्त्र-शस्त्र देते हैं. वह महिषासुर से युद्ध करती हैं और उसे पराजित करती हैं. इस कथा में एक असाधारण बात है: जिस काम को देवता मिलकर नहीं कर पाए, उसे देवी पूरा करती हैं. यहां दुर्गा की अवधारणा आज की नहीं है. हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी एक टेराकोटा मुहर की व्याख्या में भी एक स्त्री को दो बाघों से जूझते और उन्हें नियंत्रित करते हुए देखा गया है.

ऋग्वेद का वाक् सूक्त तो साफ कहता है- मैं ही रुद्रों और वसुओं के साथ विचरण करती हूं, मैं ही शत्रुओं के वध के लिए रुद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं. दुर्गा का स्पष्ट उल्लेख तैत्तिरीय आरण्यक में भी मिलता है. यहां देवी दुखों से पार उतारने वाली और अग्नि के समान तेजस्वी शक्ति के रूप में सामने आती हैं.

भारत माता भी तो दुर्गा ही है

यही अवधारणा रही होगी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के वंदे मातरम् की. उन्होंने मातृभूमि का चित्रण देवी के रूप में किया. गीत में मां को दुर्गा के रूप में संबोधित करते हुए कहा गया है कि वह दस भुजाओं में अस्त्र धारण करती हैं. हालांकि 1905 में अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता का जो प्रसिद्ध चित्र बनाया, उसमें वह चार भुजाओं वाली सौम्य तपस्विनी के रूप में नजर आती हैं. उनके हाथों में वेद, धान की बालियां, माला और श्वेत वस्त्र हैं. मगर आजादी के क्रांतिकारियों की कल्पना में भारत माता की छवि एक सशक्त देवी की भी थी.

पिछले चार हजार साल के इतिहास में सिंह पर सवार, हथियारों से लैस युद्ध की देवियों की आराधना के उदाहरण मिलते हैं. मगर उनकी शक्ति की प्रतिध्वनि हमारे समाज में वास्तविक स्त्रियों के जीवन में उतनी स्पष्ट क्यों नहीं सुनाई देती? जिस दुनिया में स्त्री की शक्ति की उपासना होती रही है, जहां उसकी आराधना तंत्र-मंत्र के चरम तक पहुंच जाती है, वहीं अपने देश ही नहीं, दुनिया के कई समाजों में स्त्री को हथियार उठाकर संहार करते या अपने अधिकारों के लिए लड़ते देखना सहज नहीं माना जाता. शायद इसी वजह से सिंहवाहिनी देवी जैसे उदाहरण धार्मिक कल्पना में तो मिलते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उनकी शक्ति को स्वीकार करने की सहजता कम दिखाई देती है.

मानव जाति के आधुनिक इतिहास में स्त्रियों को सौम्य बने रहने के लिए कंडीशन किया गया. उन्हें सुंदर, सभ्य, संस्कारी, घरेलू काम में दक्ष और अपने व्यवहार से परिवार के सभी सदस्यों को खुश रखने वाली स्त्री बनने की सीख दी गई. छल-कपट और दांव-पेच से भरे हिंदी टीवी धारावाहिकों में भी आदर्श स्त्री अक्सर वही होती है, जो इन सबके बीच अपने परिवार के लिए समर्पित रहती है. फिल्मों में फूल बने अंगारे, तेजस्विनी और मर्दानी जैसी स्त्रियां जरूर दिखाई देती हैं, लेकिन वे अपवाद की तरह सामने आती हैं.

समाज असल जीवन में ऐसी स्त्रियो को लेकर सहज नहीं

आदर्श स्त्री की कल्पना अक्सर ऐसी बनाई जाती है, जो दूसरों के लिए सब कुछ सह ले, लेकिन अपने लिए सवाल न उठाए. इसके उलट दुर्गा का रूप अन्याय के सामने चुप रहने की नहीं, उससे टकराने की प्रेरणा देता है.

यूनान की देवी सेइबल, मिस्र की सेखमेत, कुषाण देवी नाना और हमारी दुर्गा

संभवतः यह भारतीय समाज का विरोधाभास ही है कि वह शक्ति की देवी दुर्गा और प्रेम के देवता कृष्ण की पूजा तो करता है, मगर अपनी दुनिया में ऐसे किरदारों को लेकर हमेशा सहज नहीं रहता. वह देवी की निर्भीकता की प्रशंसा करता है, लेकिन वास्तविक स्त्री की निर्भीकता को अनुशासनहीनता, विद्रोह या परिवार के खिलाफ जाना मानने लगता है.

सवाल पूछने वाली स्त्रियों की लंबी परंपरा

भारतीय इतिहास और परंपरा में ऐसी स्त्रियों के उदाहरण भी हैं, जिन्होंने स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाए. वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी का उल्लेख सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वे विदुषी थीं, बल्कि इसलिए भी कि वे ज्ञान और अस्तित्व से जुड़े कठिन प्रश्न पूछती थीं. गार्गी ने याज्ञवल्क्य से ब्रह्मांड के आधार को लेकर ऐसे कठिन सवाल किए कि उन्होंने उन्हें चेतावनी दी कि वे अपनी सीमा न लांघें, वरना उनका सिर फट सकता है. हैरत की बात है कि उपनिषदों में मौजूद ऐसी सवाल पूछने वाली स्त्रियां हमारी देवी नहीं हैं. सरस्वती की पूजा ज्ञान की देवी के रूप में होती है, मगर उनकी लोकप्रिय छवि में पुरुषों के ज्ञान को चुनौती देने वाली स्त्री का रूप बहुत कम दिखाई देता है.

इसी तरह महाभारत में द्रौपदी का किरदार है. जुए में दांव पर लगाए जाने और सभा में अपमानित किए जाने के प्रसंग में वह सत्ता और धर्म के दावेदारों से पूछती हैं कि जब युधिष्ठिर पहले स्वयं को हार चुके थे, तो उन्हें दांव पर लगाने का अधिकार उनके पास कैसे बचा था? यह सवाल सिर्फ उनके अपमान का नहीं, स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व और उसके अधिकार का भी था. द्रौपदी के सवाल सत्ता और धर्म की व्याख्या करने वालों को चुनौती देते हैं.

आधुनिक भारत में सावित्रीबाई फुले ने स्त्रियों और वंचित समुदायों की शिक्षा के लिए काम किया. जब लड़कियों की शिक्षा को सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ता था, तब उन्होंने ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर स्कूल खोले और शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाया. अपमान और विरोध झेलने के बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा. आज समाज का एक बड़ा हिस्सा उन्हें राष्ट्रनायिका के रूप में स्वीकार करता है, लेकिन स्त्रियों और जाति के सवाल पर उनके विचारों को लेकर असहजता अब भी दिखाई देती है.

सावित्री बाई फुले

सड़क पर उतरती स्त्रियां: पुराने संघर्ष, नये सवाल

यह सवाल आज इसलिए मौजूं है कि जिस देश में दुर्गा की पूजा धूमधाम से हो रही है, उसी देश में नेहा बोरा और नेहा सिंह राठौर जैसी स्त्रियों की सार्वजनिक सक्रियता और सत्ता से सवाल पूछने के उनके तरीके पर असहज प्रतिक्रियाएं भी सामने आती हैं. जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में शामिल युवतियों की भाषा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “कल्चरल शॉक” की बात कही थी. उन्होंने सवाल उठाया था कि “हमारी बेटियां” ऐसी भाषा कैसे इस्तेमाल कर सकती हैं. इससे हमारे मुख्यधारा के समाज की सोच जाहिर होती है. जब स्त्रियां सार्वजनिक जीवन में अपनी नाराजगी और असहमति व्यक्त करती हैं, तो उनके राजनीतिक सवालों से पहले उनके व्यवहार और संस्कारों की परीक्षा होने लगती है.

हालांकि आज की स्त्रियां दुर्गा और काली बनकर पूजित होना भी नहीं चाहतीं. वे देवत्व के उस बोझ से छुटकारा चाहती हैं, जो उन्हें आम इंसान की तरह जीने नहीं देता. वे इंसान बनकर उसी तरह संघर्ष करना चाहती हैं, जैसे पुरुष करते रहे हैं. वे उस सामाजिक बोझ से मुक्त होना चाहती हैं, जो समाज ने एक आदर्श स्त्री के नाम पर उनके सिर पर डाल दिया है.

देवी नहीं बनना चाहतीं आज की स्त्रियां

वे नहीं चाहतीं कि हर बार उन्हें त्याग, सहनशीलता या असाधारण साहस की मूर्ति बनाकर पेश किया जाए. वे गलती करने, असहमति जताने, अपने लिए चुनाव करने, असफल होने और फिर कोशिश करने की वही स्वतंत्रता चाहती हैं, जो किसी भी व्यक्ति को मिलनी चाहिए. वे उस भाषा के बोझ से भी छुटकारा चाहती हैं, जो उनके लिए समाज ने तय कर दिया है.

आंदोलनों की नई नेता नेहा बोरा

दुर्गा के बरक्स सड़क पर सवाल उठाती स्त्री में उसी शक्ति का एक दूसरा, वास्तविक और मानवीय रूप दिखाई देता है. दुर्गा की कथा में देवता अपनी शक्तियां और अस्त्र-शस्त्र देवी को सौंपते हैं और उनसे शत्रु का संहार करने का आग्रह करते हैं. इस कथा को एक राजनीतिक रूपक की तरह पढ़ें, तो सवाल उठता है: जब सत्ता और व्यवस्था के अपने उपाय नाकाम पड़ते हैं, तब क्या स्त्री की शक्ति का आह्वान सिर्फ संकट से उबरने के लिए किया जाता है? क्या उस शक्ति को सम्मान तो मिलता है, लेकिन सत्ता और निर्णय लेने का अधिकार नहीं?

भारत माता की छवि को लेकर भी ऐसा सवाल उठाया जा सकता है. मातृभूमि को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, उसके नाम पर बलिदान मांगे गए, लेकिन स्वतंत्र भारत की वास्तविक सत्ता किसी देवी के हाथ में नहीं, मनुष्यों और संस्थाओं के हाथ में रही. प्रतीक के रूप में स्त्री को सर्वोच्च स्थान देना और वास्तविक जीवन में स्त्रियों को बराबरी देना दो अलग बातें हैं.

आज की आंदोलनकारी स्त्रियां इसीलिए अलग हैं. वे पुरुषों के आग्रह पर नहीं, अपने सवालों को लेकर लड़ रही हैं. नेहा बोरा जैसे छात्र नेतृत्व के उदाहरण में स्त्री केवल किसी आंदोलन की महिला विंग का हिस्सा नहीं है; वह खुद आंदोलन को दिशा देने, मांगें उठाने और सत्ता से जवाब मांगने की भूमिका में है. वे इस आंदोलन की नेता हैं. परीक्षा और भर्ती व्यवस्था में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन करती युवतियां अपने भविष्य के सवालों को सार्वजनिक और राजनीतिक सवाल बना रही हैं. उनके साथ खड़े युवा पुरुष भी सहजता से स्त्री नेतृत्व को स्वीकार करते हैं.

यह बदलाव मामूली नहीं है. यहां स्त्री किसी देवी की भूमिका नहीं निभा रही. वह अपनी सीमाओं, कमजोरियों, गुस्से, असहमति और आकांक्षाओं के साथ एक नागरिक की तरह सामने आ रही है. उसे असाधारण साबित होने की जरूरत नहीं है; उसके सवालों को सुने जाने के लिए उसका देवी होना जरूरी नहीं है.

देवी को हथियार देकर युद्ध में भेजा जाता है. आज की स्त्री अपने सवालों के साथ खुद मैदान में उतर रही है.

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