भवन बन रहे हैं, शिक्षक भी बहाल हो रहे, मगर क्या सीख भी रहे हैं सरकारी स्कूल के बच्चे?

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बिहार की स्कूली शिक्षा में सुधार का आकलन स्कूलों की इमारतों, शिक्षकों की नियुक्ति या सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि बच्चे कितना सीख रहे हैं और कितने आत्मनिर्भर, अनुशासित व संवेदनशील नागरिक बन पा रहे हैं। लेकिन व्यवस्था की खामियां हर स्तर पर मौजूद हैं।

अमित झा

बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नए शिक्षकों की नियुक्ति हो रही है, प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहे हैं और नई योजनाएं लागू की जा रही हैं। इसके बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता में ऐसा बदलाव नहीं दिखता, जिससे बिहार की तुलना विकसित शिक्षा व्यवस्थाओं से की जा सके। निकट भविष्य में भी बड़े बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल लगता है। इसकी वजह यह है कि शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं किसी एक स्तर तक सीमित नहीं हैं।

शिक्षा व्यवस्था की सफलता का पैमाना विभाग की इमारतें, अधिकारियों की संख्या या शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं हो सकतीं। इसका वास्तविक पैमाना विद्यार्थी हैं। बच्चे कितना सीख रहे हैं, कितने आत्मनिर्भर, अनुशासित, संवेदनशील और आधुनिक दृष्टिकोण वाले बन पा रहे हैं, इसी आधार पर शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन होना चाहिए। लेकिन हमारी व्यवस्था में बच्चों को समझने और उनकी जरूरतों के अनुरूप शिक्षा देने पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है।

बाल मनोविज्ञान की अनदेखी

बच्चे अपने परिवार, समाज और अलग-अलग सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से विद्यालय आते हैं। उनके व्यवहार, सीखने की क्षमता और जरूरतों को समझना शिक्षा की पहली शर्त है। इसके बावजूद शिक्षा व्यवस्था के लगभग किसी भी स्तर पर बाल मनोविज्ञान और बच्चों के विकास की प्रक्रिया को समझने वाले विशेषज्ञों की भूमिका प्रभावी नहीं दिखती। नीतियां बनाने से लेकर उन्हें लागू करने तक, बच्चों की वास्तविक जरूरतों के बजाय प्रशासनिक लक्ष्यों को प्राथमिकता मिलती है।

समाज में मौजूद पितृसत्ता, जातिगत भेदभाव और दूसरी रूढ़ मान्यताएं भी बच्चों के साथ विद्यालय पहुंचती हैं। शिक्षकों की भूमिका इन मान्यताओं को चुनौती देने और बच्चों में प्रगतिशील दृष्टिकोण विकसित करने की होनी चाहिए। लेकिन अनेक शिक्षक स्वयं उन्हीं सामाजिक पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हैं। वैचारिक रूप से प्रगतिशील शिक्षकों की संख्या बहुत कम दिखाई देती है।

शिक्षक हैं, लेकिन प्रशिक्षण कितना कारगर?

बीपीएससी और टीईटी जैसी प्रक्रियाओं से शिक्षकों की नियुक्ति को सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन चयन प्रक्रिया और प्रभावी शिक्षण दो अलग-अलग चीजें हैं। शिक्षक को विषय का ज्ञान होने के साथ यह भी मालूम होना चाहिए कि अलग-अलग स्तर के बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए, कक्षा को कैसे संभाला जाए और सीखने में पीछे रह गए बच्चों की मदद कैसे की जाए।

व्यवहार में अनेक शिक्षकों को कक्षा प्रबंधन और विषयवस्तु की बुनियादी समझ में कठिनाई होती है। कई शिक्षक अपनी कक्षा के पाठ्यक्रम से भी पूरी तरह परिचित नहीं होते। हर साल पांच दिन का आवासीय प्रशिक्षण देने की व्यवस्था है, लेकिन प्रशिक्षण का वास्तविक लाभ कक्षा में कितना दिखाई देता है, यह गंभीर सवाल है। प्रशिक्षण को केवल औपचारिकता बनाने के बजाय शिक्षकों की वास्तविक समस्याओं से जोड़ना जरूरी है। जरूरत ऐसे प्रशिक्षकों और मॉनिटरों की है, जो विद्यालय पहुंचकर व्यावहारिक समाधान बता सकें।

भाषा बनती है सीखने में बाधा

बिहार के अनेक विद्यालयों में बच्चे ऐसी भाषाएं बोलते हैं, जिन्हें उनके शिक्षक नहीं समझते। किसी विद्यालय में संथाली, बांग्ला और मैथिली बोलने वाले बच्चे हो सकते हैं, जबकि शिक्षक भोजपुरी या अवधी भाषी हो सकता है। संथाल और उरांव जैसे आदिवासी समुदायों के बच्चों के विद्यालयों में उनकी भाषा जानने वाले शिक्षक नहीं होने से शुरुआती शिक्षा और संवाद में कठिनाई आती है।

छह साल का बच्चा जब पहली बार विद्यालय पहुंचता है, तो उससे ऐसी भाषा में सीखने की अपेक्षा की जाती है, जिसे वह ठीक से समझता भी नहीं। शिक्षक और बच्चे के बीच संवाद नहीं बन पाता। धीरे-धीरे शिक्षक समझाना कम कर कॉपी पर लिखवाने लगता है। बच्चे जो लिख लेते हैं, उसी को सीखने का प्रमाण मान लिया जाता है। इससे उनकी वास्तविक समझ विकसित नहीं हो पाती और कक्षा के स्तर के अनुरूप सीखना भी कठिन हो जाता है।

बिहार जैसे बहुभाषी राज्य में हर भाषा में किताबें उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी शुरुआती कक्षाओं में बच्चों की मातृभाषा का सहारा लेकर हिंदी सिखाने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके साथ पहली कक्षा से अंग्रेजी का बोझ डालने के बजाय बच्चों की बुनियादी भाषाई समझ मजबूत करने पर जोर देना चाहिए।

विद्यालय पर समाज का दबाव

विद्यालय केवल शिक्षकों की जिम्मेदारी नहीं, समाज की भी साझा संपत्ति है। शिक्षक दिन के कुछ घंटे विद्यालय में रहते हैं, जबकि बाकी समय परिसर समाज के भरोसे होता है। कई विद्यालयों में खिड़कियां, दरवाजे और ताले टूटे मिलते हैं। परिसर में शराब की बोतलें और सिगरेट के अवशेष पड़े रहते हैं। कहीं आसपास अवैध शराब निर्माण की गतिविधियां होती हैं, तो कहीं असामाजिक गतिविधियों की शिकायत करने पर शिक्षकों को टकराव का डर रहता है।

शिक्षक जिन बच्चों को पढ़ाते हैं, उनके अभिभावकों से ही उनका सामना होता है। इसलिए स्थानीय लोगों के खिलाफ शिकायत करने में भी उन्हें संकोच और असुरक्षा का अनुभव होता है। विद्यालयों की सुरक्षा और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करने के लिए समुदाय की भागीदारी तथा शिकायतों पर कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक है।

पढ़ाने से ज्यादा प्रशासनिक काम

शिक्षकों पर विभागीय काम का बोझ भी लगातार बढ़ रहा है। यू-डायस, ई-शिक्षाकोष, एपीएएआर आईडी और विभिन्न अभियानों के पोर्टल के लिए आंकड़े भरने, गूगल फॉर्म जमा करने, वीडियो देखने और रिपोर्ट भेजने जैसे काम नियमित रूप से करने पड़ते हैं। कई बार थोड़े समय में फॉर्मेट भरकर बीआरसी कार्यालय में जमा करने का निर्देश मिलता है। शिक्षकों को प्रिंट निकलवाने, दस्तावेज भरने और रसीद लेने के लिए विद्यालय से बाहर जाना पड़ता है।

एपीएएआर आईडी जैसी व्यवस्था में अभिभावकों की सहमति जरूरी होने पर भी जमीनी स्तर पर शत-प्रतिशत लक्ष्य पूरा करने का दबाव बनाया जाता है। जिन अभिभावकों को इस प्रक्रिया की जानकारी नहीं है, उनसे संवाद करने और उनकी शंकाएं दूर करने के बजाय लक्ष्य पूरा करने पर जोर दिया जाता है। इससे शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है और सहमति जैसी जरूरी प्रक्रिया औपचारिकता बन जाने का खतरा पैदा होता है।

शिक्षकों की ड्यूटी राजनीतिक सभाओं, रैलियों और अन्य गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में भी लगाई जाती है। वहीं, किसी विद्यालय में दो शिक्षक छुट्टी पर चले जाएं तो उनकी जगह अस्थायी रूप से दूसरे शिक्षक उपलब्ध कराने की प्रभावी व्यवस्था नहीं है। नतीजा यह होता है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और उपलब्ध शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

मोबाइल और निगरानी का दबाव

विभागीय संदेशों, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिंक, उपस्थिति और रिपोर्टिंग के लिए मोबाइल फोन पर निर्भरता इतनी बढ़ गई है कि शिक्षक हर कुछ मिनट पर व्हाट्सऐप देखते रहते हैं। कभी बैठक का लिंक एक घंटे पहले आता है, तो कभी दोपहर में मिले निर्देश पर शाम तक रिपोर्ट जमा करनी होती है। निर्देश छूट जाने पर अनुपस्थित चिह्नित होने का डर अलग रहता है।

उपस्थिति दर्ज करने के लिए मोबाइल ऐप पर निर्भर रहने के बजाय विद्यालयों में बायोमेट्रिक या फेस रिकग्निशन जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी विचार किया जा सकता है। तकनीक का उद्देश्य शिक्षकों का काम आसान करना होना चाहिए, न कि उन्हें लगातार निगरानी और संदेशों के दबाव में रखना।

बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए केवल नियुक्तियां, ऐप, पोर्टल और योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण, कक्षा में काम करने की स्वतंत्रता, व्यावहारिक सहयोग और सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियां चाहिए। विद्यालयों की समस्याएं सुनने और उनका समाधान करने वाली व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है जितनी ऊपर से निर्देश भेजने वाली व्यवस्था।

सबसे बढ़कर, शिक्षा के केंद्र में बच्चे होने चाहिए। जब तक नीतियों, प्रशिक्षण, प्रशासन और समाज की भूमिका का मूल्यांकन बच्चों के सीखने और उनके विकास के आधार पर नहीं होगा, तब तक बदलाव की घोषणाएं होती रहेंगी, लेकिन शिक्षा की बुनियादी समस्याएं बनी रहेंगी।

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