BRICS- इतिहास बड़े काम याद रखता है, ताम-झाम और बड़ी-बड़ी बातों को नहीं

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विडंबना यह है कि जिस न्यू डेवलपमेंट बैंक को ब्रिक्स की सबसे ठोस उपलब्धि माना जाता है, जिसे मनमोहन सिंह के दौर में बढ़ाया गया. उसे और मजबूत करने की जगह भारत का जोर IMF और World Bank जैसी मौजूदा संस्थाओं में ग्लोबल साउथ की हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर ज्यादा दिखाई देता है. जबकि भारत के पास मौका था कि वह NDB को वैश्विक दक्षिण की सबसे प्रभावशाली वैकल्पिक विकास-वित्त संस्था बनाने की महत्वाकांक्षा सामने रखता.

इस रिपोर्ट के साथ लगी तस्वीर न्यू डेवलपमेंट बैंक की है, जिसे बोलचाल में ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक भी कहा जाता है. इसका मुख्यालय शंघाई में है और इसके पहले प्रमुख केवी कामथ थे. मार्च 2026 तक यह बैंक करीब 43 अरब डॉलर की 139 परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका था. इसमें करीब 10 अरब डॉलर की परियोजनाएं भारत की हैं. ब्रह्मपुत्र पर गुवाहाटी के तीसरे पुल और मध्य प्रदेश की सड़कों के लिए भी इस बैंक से पैसा मिला है. यह बैंक इस मायने में महत्वपूर्ण है कि विकासशील देशों के पास विश्व बैंक और IMF जैसी पश्चिम-केंद्रित बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं के समानांतर अपना एक विकल्प मौजूद है. इसे ब्रिक्स की अब तक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है.

आपको मालूम है कि यह बैंक कैसे बना?

2012 में आज की ही तरह ब्रिक्स का सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ था. मगर तब आज जैसा तामझाम नहीं था, इतनी ब्रांडिंग नहीं थी और हर बात को इवेंट बना देने का चलन भी इतना नहीं था. ताज होटल में हुए इस सम्मेलन में हमारे अपेक्षाकृत संकोची प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुआई में ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक का औपचारिक विचार सामने आया. नेताओं ने इसके बाद अपने वित्त मंत्रियों को इसकी व्यवहार्यता और उपयोगिता की जांच करने को कहा.

इसके बाद 2013 के डरबन सम्मेलन में बैंक बनाने पर सहमति आगे बढ़ी और जुलाई 2014 में फोर्टालेजा, ब्राजील में इसके गठन का समझौता हुआ. बैंक ने 2015 में काम शुरू किया. तब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं थे. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत भारत की पहल से हुई थी और इसमें मनमोहन सिंह की भूमिका को नजरअंदाज करना मुश्किल है.

2012 के आयोजन में एक और महत्वपूर्ण वित्तीय पहल पर काम शुरू हुआ- Contingent Reserve Arrangement यानी CRA. इसका उद्देश्य यह था कि अगर किसी सदस्य देश को भुगतान-संतुलन या विदेशी मुद्रा की गंभीर समस्या आती है तो उसे ब्रिक्स के भीतर से अल्पकालिक सहायता मिल सके. यानी हर संकट में IMF के दरवाजे पर जाने की मजबूरी कम हो.

2012 में इसकी रूपरेखा पर काम शुरू हुआ, 2013 में इसके गठन पर सहमति बनी और 2014 में इसका समझौता हुआ. इसकी कुल क्षमता 100 अरब डॉलर की है. इसमें चीन की 41 अरब डॉलर, जबकि भारत, रूस और ब्राजील की 18-18 अरब डॉलर और दक्षिण अफ्रीका की 5 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता है.

संयोग की बात है कि अब तक इसके इस्तेमाल की कोई बड़ी सार्वजनिक मिसाल सामने नहीं आई है. लेकिन इसका महत्व इस बात में है कि ब्रिक्स देशों ने अपने लिए एक साझा वित्तीय सुरक्षा-जाल खड़ा किया. IMF भी इसे क्षेत्रीय वित्तीय सुरक्षा व्यवस्था के रूप में मान्यता देता है.

2012 के दौर में ब्रिक्स की आर्थिक महत्वाकांक्षा का एक और पहलू था—डॉलर पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना आपसी कारोबार को बढ़ाना. स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और क्रेडिट सुविधा की दिशा में कदम उठाए गए. बाद के वर्षों में ‘साझा मुद्रा’ ब्रिक्स की बहस का हिस्सा बना, लेकिन वह कभी औपचारिक ब्रिक्स मुद्रा के रूप में सामने नहीं आ सका.

और आज तो भारत खुद साझा ब्रिक्स मुद्रा से दूरी बनाए हुए है. 2026 के सम्मेलन में भी भारत ने कॉमन करेंसी के बदले स्थानीय मुद्राओं में आपसी कारोबार और क्रास बॉर्डर पेमेंट पर जोर दिया है. दरअसल आज का भारत अमेरिका से दुश्मनी मोल नहीं ले सकता और ब्रिक्स की अपनी करेंसी का मतलब ही डॉलर पर निर्भरता कम करना है. 2026 के तामझाम भरे सम्मेलन के बीच भारत ने इशारा किया है कि वह नहीं चाहता कि ब्रिक्स एंटी वेस्ट मंच में बने. जबकि ग्लोबल साउथ का विचार ही है कि वह इस इलाके की ताकत को मजबूत करे. बहरहाल इस सम्मेलन में हमारे पीएम ने कई गोल-मोल बातें कही हैं. जैसे ग्लोबल साउथ की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी, युनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल में सुधार, एआई गवर्नेंस वगैरह. हालांकि एक डर यह भी है कि कहीं चीन मजबूत न हो जाये. चीन के साथ भारत के आज के रिश्ते तनावपूर्ण भी हैं और भारत सहयोग भी चाहता है.

विडंबना यह है कि जिस न्यू डेवलपमेंट बैंक को ब्रिक्स की सबसे ठोस उपलब्धि माना जाता है, जिसे मनमोहन सिंह के दौर में बढ़ाया गया. उसे और मजबूत करने की जगह भारत का जोर IMF और World Bank जैसी मौजूदा संस्थाओं में ग्लोबल साउथ की हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर ज्यादा दिखाई देता है. जबकि भारत के पास मौका था कि वह NDB को वैश्विक दक्षिण की सबसे प्रभावशाली वैकल्पिक विकास-वित्त संस्था बनाने की महत्वाकांक्षा सामने रखता.

ब्रिक्स देशों की साझा मुद्रा की जगह भारत ने स्थानीय मुद्राओं में आपसी लेन-देन और भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की बात की है. पीयूष गोयल ने इस बीच UPI की खूब ब्रांडिंग की है. लेकिन क्या अलग-अलग देशों की भुगतान प्रणालियां वास्तव में बड़े पैमाने पर एक-दूसरे से जुड़ पाती हैं और क्या इससे ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और वित्तीय संबंधों में कोई बड़ा बदलाव आता है. यह देखने वाली बात होगी.

अगर इस ब्रिक्स सम्मेलन में और इससे पहले मोदी के शासनकाल के तीन और सम्मेलन को देखें तो भारत की तरफ से वैसी कोई मजबूत पहल या प्रस्ताव नहीं दिखता, जैसा 2012 में हुआ था. साफ है कि मनमोहन सिंह ठोस बात करने वाले और संस्थाओं के निर्माता थे.

इस ब्रिक्स समिट में भारत के पक्ष पर अमेरिका का दबाव और उसकी विदेश नीति का असमंजस साफ नजर आता है. वह ब्रिक्स में बने रहना चाहता है और उसकी मूल भावना की चर्चा दबे स्वर में करता है. मगर उसे डर है कि वह कुछ ऐसा न करे, जिससे कल डोनाल्ड ट्रंप नाराज होकर कोई सार्वजनिक बयान न दे दें और कोई टैरिफ न लाद दें. जैसा वे पहले करते रहे हैं. हालांकि कल सम्मेलन में बिना ट्रंप का नाम लिये टैरिफ की चर्चा जरूर हुई है. मगर वह कुछ इस तरह कि धूमिक के शब्दों में, ‘कांख भी ढकी रहे और विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे.’

2012 के ब्रिक्स सम्मेलन में सिर्फ पांच देश थे, अब 11 देश हो गये हैं. इस सम्मेलन की सबसे अच्छी बात है, आतंकवाद का विरोध, सांप्रदायिकता का विरोध और फिलिस्तीन की पक्षधरता. मगर इस सम्मेलन में कोई ठोस आर्थिक या संस्थागत फैसला होता नजर नहीं आया है. बड़ी बातें, बड़ा मंच, बड़ी ब्रांडिंग के सिवा. इससे भारत सरकार जो हाल के दिनों में छवि से संकट से जूझ रही है, वह अपनी छवि तो बना सकती है, मगर इतिहास में ग्लोबल साउथ के अगुआ देश का टैग हासिल नहीं कर सकती. ब्रिक्स के इतिहास की जब भी चर्चा होगी तो 2012 के सम्मेलन की चर्चा आज की तुलना में कहीं ज्यादा होगी, क्योंकि उस सम्मेलन में ठोस फैसले हुए और उससे मजबूत संस्थाएं निकलीं. आज तो तामझाम, बड़ी बातें और दिखावे का सम्मेलन है

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