नीतीश के पाला बदलने से किसे छुटकारा मिला?
सोनिया गांधी कहती हैं, अच्छा हुआ नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन से चले गए, “छुटकारा मिला”; दिग्विजय सिंह को लगता है कि उन्हें रोकना चाहिए था. दो विरोधी टिप्पणियों के बीच दो साल का वह राजनीतिक सफर है, जिसमें नीतीश ने सत्ता तो बचा ली, लेकिन भाजपा को बिहार और केंद्र में नई ताकत मिली और राहुल गांधी विपक्ष के सबसे बड़े राष्ट्रीय चेहरे के तौर पर उभरे. आखिर नीतीश के जाने से किसे क्या मिला और किसे क्या खोना पड़ा?

सोनिया गांधी ने कल इंडिया गठबंधन की बैठक के दौरान कहा, अच्छा हुआ नीतीश कुमार समय रहते इंडिया गठबंधन से निकल गये. उन्होंने इसके लिए जो शब्द इस्तेमाल किये, वे ये हैं, “अच्छा हुआ वे चले गये, छुटकारा मिला. वे इंडिया अलायंस में नहीं रहना चाहते थे. यह उनके लिए अच्छा ही था. वे वहीं जा रहे थे. वे इंडिया ब्लॉक से बाहर निकलने के तरीके ढूंढ रहे थे.” यह जवाब उन्होंने दिग्विजय सिंह के उस सवाल पर दिया था, जब उन्होंने कहा था, “हमें नीतीश कुमार को इंडिया ब्लॉक से जाने नहीं देना चाहिए था, अगर वे आज हमारे साथ होते तो स्थितियां अलग होतीं.”
ऐसे में इन दो बयानों से दो बड़े सवाल उठते हैं. क्या नीतीश के इंडिया ब्लॉक में रहने से स्थितियां अलग होतीं? और क्या खुद नीतीश इंडिया ब्लॉक से अलग होना चाहते थे और क्या सचमुच इंडिया ब्लॉक को उनके जाने से छुटकारा मिला?
चूंकि उन दिनों में इंडिया टुडे हिंदी के बिहार संवाददाता के तौर पर इस पूरे प्रकरण को कवर कर रहा था और पत्रिका के लिए एक लंबी स्टोरी और वेबसाइट के लिए तीन-चार स्टोरी लिखी थीं, इसलिए इस पूरे प्रकरण को नजदीक से समझने का मौका मिला. तब मैंने नीतीश कुमार की एक तरह से आधिकारिक आवाज समझे जाने वाले केसी त्यागी से भी बात की थी और कांग्रेस के लोगों से भी अनौपचारिक बातें हुई थीं. वह साल 2024 का पहला महीना था, जब यह सब घट रहा था.
अगर हम जनवरी 2024 से अक्टूबर 2026 तक की घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो नीतीश के उस फैसले के कई रोचक नतीजे दिखते हैं. नीतीश के इंडिया गठबंधन से निकलने से नीतीश को क्या लाभ हुआ, भाजपा को क्या लाभ मिला और क्या सचमुच इंडिया गठबंधन और कांग्रेस घाटे में रही? सवाल यह भी हैं कि आज नीतीश कहां हैं और राहुल कहां? और आखिर कांग्रेस चाहती क्या है? इंडिया गठबंधन का भविष्य क्या है? इन सब सवालों के बीच एक बात साफ है कि कुछ भी साफ नहीं है, सब उलझा हुआ है.
किन हालात में नीतीश ने छोड़ा इंडिया गठबंधन
वह 23 जून, 2023 का दिन था, जब पटना में पहली बार नीतीश की अगुआई में विपक्षी दलों का मजमा लगा था. मुझे याद है, नीतीश के सीएम वाले सरकारी आवास के एक हॉल में बैठक हुई थी. आखिर में प्रेस कांफ्रेंस के वक्त लालू जी ने राहुल से शादी का सवाल पूछकर पत्रकारों को एक मसाला दे दिया था. केजरीवाल आये थे, मगर शायद बीच में चले गये या पीसी के वक्त नहीं थे. मगर उस बैठक में भी यह दिख रहा था कि राहुल गांधी की सहजता नीतीश के मुकाबले लालू से अधिक थी. जबकि नीतीश खुद को इस विपक्षी एकता का अगुआ साबित करने में जुटे थे.
पहले उन्हें उम्मीद थी कि विपक्षी दल उन्हें पीएम कैंडिडेट बनायेंगे. फिर लगा कि शायद संयोजक बना दें. मगर पहले उनकी मर्जी के बिना नाम इंडिया गठबंधन रख दिया गया, फिर आखिर-आखिर तक उन्हें संयोजक नहीं बनाया गया. इस बीच कई बैठकें हुईं और नीतीश की असहजता बढ़ती चली गई.
आखिरकार यह चरम पर पहुंच गया और नीतीश की तरफ से बोलते हुए उस वक्त जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में व्यस्तता और कांग्रेस की लेटलतीफी पर सवाल उठाने लगे. उन्होंने उस वक्त मुझसे कहा था, “नीतीश जी का असल कंसर्न इंडिया गठबंधन की सुस्त रफ्तार को लेकर है. भाजपा और एनडीए चुनाव की तैयारी में तेजी से जुटे हैं, जबकि कांग्रेस को जैसे इसकी कोई फिक्र ही नहीं है. उन्हें यह बात भी नहीं कचोटती कि दो टर्म से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद खाली पड़ा है. नीतीश जी इसी वजह से सितंबर, 2022 से ही विपक्षी दलों को एकजुट करने के अभियान में जुट गये थे, मगर कांग्रेस कभी इस यात्रा तो कभी उस चुनाव में जुटी रही.”

कहते हैं, इंडिया गठबंधन की चौथी बैठक में भी जब नीतीश का नाम संयोजक के रूप में तय नहीं हुआ तो उनके सब्र का बांध टूटने लगा था. नई दिल्ली की चौथी बैठक में जब डीएमके नेता टीआर बालू ने उनसे उनके भाषण का हिंदी अनुवाद मांगा तो वे भड़क उठे. कहने लगे, “हिंदी भारत की राजभाषा है, आपको अनुवाद क्यों चाहिए.” वे गठबंधन के नाम से भी असहमत थे.
उस वक्त जब मैंने जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार से पूछा तो उन्होंने कहा, “नीतीश जी ने संयोजक पद के लिए आवेदन दिया है क्या?” बाद में संजय झा ने कहा, “हमें तो लोकसभा में 16 सीटें चाहिए, कांग्रेस अपना मसला राजद से समझ ले.” इन बयानों से जाहिर है कि कटुता काफी बढ़ गई थी.
2023 के आखिरी दिनों में नीतीश ने ललन सिंह को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटा दिया और खुद अध्यक्ष बन गये. इसके बाद सुगबुगाहट फैलने लगी कि नीतीश अब इंडिया गठबंधन से अलग हो सकते हैं. ललन सिंह को राजद के करीब माना जाता था और उनके हटने को भी इस पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देखा गया.
इस बीच 13 जनवरी को इंडिया गठबंधन की जूम बैठक हुई. नीतीश के नाम पर संयोजक बनाने को लेकर चर्चा हुई, लेकिन तत्काल सहमति नहीं बन सकी. ममता बनर्जी की सहमति का सवाल उठा और नीतीश ने भी तत्काल पद स्वीकार नहीं किया. साथ ही मल्लिकार्जुन खड़गे को गठबंधन का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव सामने आया. यानी जिस संयोजक पद की नीतीश लंबे समय से उम्मीद कर रहे थे, उसकी भूमिका कितनी प्रभावी होती, उनके लिए शायद बड़ा सवाल था.
कभी पीएम उम्मीदवार बनने की आस लगाये नीतीश जब ठीक से संयोजक की भूमिका भी हासिल नहीं कर सके तो आखिरकार 28 जनवरी, 2024 को उन्होंने इंडिया गठबंधन और राजद दोनों का साथ छोड़ा और फिर से एनडीए में आ गये.
नीतीश फायदे में रहे, भाजपा को मिली संजीवनी
नीतीश को बहुत सोच-समझकर राह चुनने वाला नेता माना जाता है. जब वे इंडिया गठबंधन से एनडीए में आये तो उनकी नजर न सिर्फ 2024 के लोकसभा बल्कि 2025 के विधानसभा चुनाव पर भी थी. एनडीए में लौटते ही नीतीश फिर मुख्यमंत्री बन गए.
लोकसभा चुनाव में जदयू ने 16 में से 12 सीटें जीतीं. बिहार में एनडीए 40 में से 30 सीटें जीत गया. केंद्र में भाजपा 240 सीटों पर रुक गई थी और उसे सरकार चलाने के लिए सहयोगियों की जरूरत थी. ऐसे में जदयू की 12 सीटें महत्वपूर्ण हो गईं.
उन्होंने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाये रखी. 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीत लीं और जदयू 85 सीटों के साथ अपनी 2020 की 43 सीटों से लगभग दोगुनी ताकत के साथ लौटा. इस जीत में नीतीश के चेहरे और उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता को भी अहम माना गया.
नीतीश का एनडीए में लौटना भाजपा के लिए भी संजीवनी की तरह रहा. जिस तरह लोकसभा चुनाव में उसकी पार्टी 240 सीटों पर अटक गई थी, अगर नीतीश इंडिया ब्लॉक में रहते तो बिहार में भाजपा की सीटें कम हो सकती थीं. केंद्र में भी उसे जदयू के 12 सांसदों का सहयोग नहीं मिलता. हालांकि इन 12 सीटों के बिना भी एनडीए बहुमत के आंकड़े से ऊपर था, लेकिन सहयोगियों पर उसकी निर्भरता और बढ़ जाती.

भाजपा को नीतीश की वापसी का सबसे बड़ा लाभ बिहार में हुआ. वह न सिर्फ 89 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी, बल्कि 2026 में पहली बार उसे बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका भी मिला. अगर नीतीश इंडिया गठबंधन के साथ रहते तो बिहार का चुनावी समीकरण निश्चित रूप से अलग होता. यह कहना मुश्किल है कि उस स्थिति में किसे कितनी सीटें मिलतीं, लेकिन भाजपा के लिए बिहार में 2025 जैसी स्थिति हासिल करना और फिर अपना मुख्यमंत्री बनाना उतना आसान नहीं होता.
आंकड़े बताते हैं कि पाला बदलने से नीतीश और भाजपा को बड़ा लाभ हुआ. इंडिया गठबंधन को जो राजनीतिक और चुनावी फायदा नीतीश के साथ होने से मिल सकता था, वह नहीं मिला.
फिर कांग्रेस ने नीतीश को क्यों जाने दिया?
अगर कांग्रेस चाहती और उसने नीतीश को समय से संयोजक की भूमिका दे दी होती, उनकी छोटी-बड़ी इच्छाओं का सम्मान कर लिया होता तो शायद नीतीश इंडिया गठबंधन छोड़कर नहीं जाते. अगर नीतीश साथ होते तो शायद 2024 में नतीजे कुछ अलग होते. नीतीश के जाने से सिर्फ आंकड़ों का नहीं, मनोबल का भी फर्क पड़ा. अगर वह मनोबल बना होता तो शायद एनडीए आज से ज्यादा कमजोर होता और सरकार को सहयोगियों पर और निर्भर रहना पड़ता.
ऐसे में कांग्रेस ने नीतीश को क्यों जाने दिया? नीतीश के जाने से विपक्ष ने बिहार का एक बड़ा राजनीतिक आधार खो दिया. 2024 में इंडिया गठबंधन को बिहार में सिर्फ नौ लोकसभा सीटें मिलीं. 2025 में तस्वीर और खराब हुई. राजद 75 से 25 और कांग्रेस 19 से छह सीटों पर आ गई. पूरा महागठबंधन सिर्फ 35 सीटों तक सिमट गया. यह तो नीतीश के जाने का नुकसान है.
मगर साथ ही हम यह भी देखते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस 52 से बढ़कर 99 सीटों पर पहुंची और राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने. विपक्ष की राजनीति में पहली बार राहुल के पास एक औपचारिक संवैधानिक पद था, जिसके जरिए वह पूरे विपक्ष की आवाज बनने की स्थिति में आये. हाल के दिनों में राहुल की सक्रियता और आक्रामकता जैसी है, वह उन्हें एक मजबूत छवि देती है. वे लगातार सरकार पर हमलावर हैं.
ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि अगर नीतीश इंडिया गठबंधन में रहते तो क्या राहुल गांधी आज विपक्ष के इतने प्रमुख राष्ट्रीय चेहरे होते? इसी सवाल के पीछे जून 2023 से जनवरी 2024 के बीच नीतीश को लेकर कांग्रेस की असहजता की कहानी छिपी है.
तब नीतीश चाहते थे कि इंडिया गठबंधन पहले एक संगठित राजनीतिक ताकत बने. उसका नेतृत्व, सीटों का बंटवारा, साझा कार्यक्रम और चुनावी रणनीति स्पष्ट हो. जदयू लगातार नीतीश को गठबंधन का सूत्रधार बता रहा था.
तब केसी त्यागी ने कहा था कि जब यह सब हो रहा है, राहुल गांधी अकेले यात्रा निकाल रहे हैं और कांग्रेस उनकी व्यक्तिगत ब्रांडिंग कर रही है. उन्होंने कहा था, “इस यात्रा का आयोजक कांग्रेस को नहीं बल्कि इंडिया गठबंधन को होना चाहिए और यह सामूहिक यात्रा होनी चाहिए.”
तो क्या कांग्रेस चाहती ही नहीं थी कि नीतीश इंडिया गठबंधन में रहें?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नीतीश सिर्फ एक सहयोगी नहीं थे. वह इंडिया गठबंधन की शुरुआती बैठकों के सूत्रधार थे. उनके पास बिहार की सत्ता थी और उनके समर्थक उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका देने की मांग कर रहे थे. दूसरे शब्दों में, नीतीश का बने रहना विपक्ष को चुनावी रूप से मजबूत कर सकता था, लेकिन तब शायद राहुल गांधी विपक्ष के निर्विवाद नेता के रूप में इतनी आसानी से नहीं उभरते. या ऐसा होता तो देर-सवेर किसी और वजह से नीतीश चले ही जाते. क्योंकि वे ऐसी असहज स्थिति में नहीं रह पाते.

नीतीश के जाने के बाद राहुल के सामने विपक्ष के भीतर एक ऐसा स्वतंत्र वरिष्ठ नेता नहीं रहा जो गठबंधन की राष्ट्रीय कमान के लिए स्वाभाविक दावेदार हो सकता था. राहुल कांग्रेस के सबसे बड़े राष्ट्रीय नेता बने रहे. 2024 के बेहतर प्रदर्शन ने उनकी स्थिति मजबूत की.
ऐसे में कह सकते हैं कि नीतीश के जाने से इंडिया गठबंधन तो कमजोर हुआ, मगर कांग्रेस और राहुल को इसका एक अप्रत्यक्ष लाभ जरूर मिला. विपक्ष के भीतर कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को चुनौती देने वाला एक स्वाभाविक शक्ति-केंद्र कमजोर हुआ और राहुल गांधी 99 सांसदों वाली कांग्रेस के नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने.
उधर नीतीश अपने स्वास्थ्य की वजह से आज सीएम की कुर्सी से अलग हैं और 12 लोकसभा सांसदों, 85 विधायकों के बावजूद उनके पास आज वह राजनीतिक ताकत नहीं बची जो 2024 में थी. नीतीश की ताकत धीरे-धीरे राजनीतिक भाजपा में शिफ्ट होती हुई दिख रही है.
सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस को भाजपा की तरह धैर्य रखना चाहिए था और नीतीश को साथ जोड़े रहना चाहिए था? क्या कांग्रेस और सोनिया गांधी की राहुल को राष्ट्रीय विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्थापित करने की दीर्घकालिक राजनीति से यह सब जुड़ा था?
क्या कांग्रेस ने यह कीमत जानबूझकर चुकाई थी? इसका प्रमाण नहीं है. इसलिए इतिहास कभी यह पूछ सकता है कि क्या कांग्रेस ने नीतीश को इसलिए जाने दिया ताकि राहुल नेता बन सकें?