कलश यात्राओं में डूबते मरते बिहारी, ये किनकी है जिम्मेदारी?

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खबर है कि दशहरा के पहले दिन राज्य में कलश यात्रा के दौरान करंट लगने से दो लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए. वहीं पूरे राज्य में 16 से अधिक लोगों की कलश में जल भरने के दौरान डूबने से मौत हो गई. यह इकलौती घटना नहीं है. हर साल जितिया, छठ और कलश में जल भरने के दौरान दर्जनों लोग मारे जाते हैं. सवाल है कि इनका जिम्मेदार कौन है?

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दुनिया भर में त्योहार का मतलब उल्लास होता है, मगर बिहार में हर काम में इतना जोखिम है कि त्योहार भी कई परिवारों में गमी का मौका बनकर सामने आता है. अब जैसे देखिये, कल दुर्गापूजा का पहला दिन था. लोग कलशों में जल भरने के लिए घर से बाहर निकले. अपने पास के घाटों तक पहुंचे. खबर है कि इस दौरान पूरे राज्य में 16 लोगों की मौत जल भरने के दौरान डूबने से हो गई है. इसे प्रभात खबर अखबार ने कंपाइल किया है. मगर इससे भी बुरी खबर पश्चिमी चंपारण से आई है, जहां एक ट्रैक्टर से जल भरने के लिए लोग जा रहे थे. तभी लटक रहे एक हाइटेंशन तार की चपेट में आकर ट्रैक्टर में करंट फैल गया. दो लोगों की मौत हो गई और दर्जनों जख्मी हो गये.

प्रभात खबर अखबार ने जलभरी के दौरान डूबकर मरने वालों की जो जानकारी दी है, उसके मुताबिक मुजफ्फरपुर, दरभंगा और सीतामढ़ी में 3-3, जबकि समस्तीपुर, शिवहर, भोजपुर, सारण, बेगूसराय, नवादा और रोहतास में 1-1 व्यक्ति की जान चली गई. वहीं, यह खबर लगभग सभी अखबारों में है कि इसी दौरान पश्चिम चंपारण के रामनगर में शोभायात्रा में ले जाए जा रहे झंडे के हाई-टेंशन तार से सटने के कारण करंट फैलने से 2 बच्चों की मौत हो गई और 18 लोग झुलस गए.

हालांकि यह कोई पहली घटना नहीं है. 2024 में जितिया पर्व पर स्नान के दौरान एक ही दिन में 46 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 37 मासूम बच्चे शामिल थे. वहीं छठ महापर्व, गंगा दशहरा और प्रतिमा विसर्जन के दौरान हर साल औसतन दर्जनों लोग अकाल मौत के मुंह में समा जाते हैं. यह सिलसिला हर पर्व पर दोहराया जाता है, जिससे यह सवाल खड़ा होता है कि चूक कहां हो रही है.

घाट ‘अचिह्नित‘ क्यों रह जाते हैं?

ऐसे आयोजनों के मौके पर घाटों को सुरक्षित रखना स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग की जिम्मेदारी है. मगर कागजों पर सुरक्षा के पुख्ता दावों के बावजूद ग्रामीण और उपनगरीय घाट असुरक्षित रह जाते हैं. जिला प्रशासन इसका एक्सक्यूज बताते हुए कहता है कि लोग चिह्नित घाटों पर नहीं जाते. मगर सच यह है कि लोग अपने नजदीकी घाटों पर जाते हैं और उन्हें सुरक्षित करना स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है.

वैसे इसके कई प्रशासनिक और भौगोलिक कारण बताये जाते हैं:

1. शहरी-केंद्रित सुरक्षा ढांचा: आपदा प्रबंधन विभाग, राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की मुस्तैदी केवल पटना, भागलपुर, मुंगेर या जिला मुख्यालयों के प्रमुख गंगा घाटों तक सीमित रहती है. राज्य में हजारों की संख्या में ऐसी सहायक नदियां, नहरें (कैनाल) और स्थानीय पोखर हैं, जहां ग्रामीण जलभरी के लिए जाते हैं. इन जगहों पर न तो लाल झंडे होते हैं और न ही बांस-बल्ली की बैरिकेडिंग.

2. नदियों की बदलती भौगोलिक संरचना: मानसून के बाद बिहार की नदियों में सिल्ट (गाद) और रेत का भारी कटाव होता है. ऊपर से शांत दिखने वाली नदी में पानी के भीतर गहरा दलदल या अचानक 10 से 15 फीट का गड्ढा बन जाता है. जिला स्तर पर इन बदले हुए तटों का पूर्व-सर्वेक्षण नहीं कराया जाता.

 3. संसाधनों की भारी कमी: राज्य में 38 जिले और हजारों संवेदनशील घाट हैं, जबकि एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की स्वीकृत कंपनियों और प्रशिक्षित गोताखोरों की संख्या सीमित है. हर पंचायत स्तर के घाट पर बोट और रेस्क्यू टीम तैनात करना वर्तमान व्यवस्था में संभव नहीं हो पा रहा है. हालांकि इसके लिए आपदा मित्र तैयार किये गये हैं, मगर वे कारगर साबित नहीं हो पा रहे.

4. अवैध खनन का प्रभाव: कई स्थानीय नदियों में अवैध बालू खनन के कारण किनारों पर गहरे गड्ढे बन जाते हैं. स्नान करने उतरे बच्चे या युवा जैसे ही उन गड्ढों में कदम रखते हैं, वे सीधे भंवर में खिंच जाते हैं.

कब लागू होगा मिशन सुरक्षा घाट

बिहार सरकार ने डूबने की घटनाओं की गंभीरता को देखते हुए इसे ‘राज्य विशिष्ट आपदा’ घोषित कर रखा है, जिसके तहत प्रत्येक मृतक के आश्रित को 4 लाख की अनुग्रह राशि दी जाती है. लेकिन केवल मुआवजा देना इस त्रासदी का स्थायी समाधान नहीं है. राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने सुरक्षा घाट के नाम से इससे बचाव के लिये मिशन शुरू किया था. वह अभी भी ठीक से लागू नहीं हो रहा है.

इस मिशन के तरह घाटों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित और असुरक्षित घोषित करना है. वहां बांस बल्लियों के सहारे घेरा बनाकर झंडियां लगाना है. गोताखोरों और बोटों की तैनाती करनी है. मगर दिक्कत यह है कि

– ‘मिशन सुरक्षा घाट’ का विस्तार प्रमुख शहरों से बाहर निकलकर प्रखंड व पंचायत स्तर तक नहीं हो पा रहा. वहां न घाटों का वर्गीकरण हो रहा. न तैराकों और गोताखोरों की तैनाती

– हर पंचायत में प्रशिक्षित स्थानीय युवाओं को लाइफ-जैकेट और रस्सियों के साथ ‘आपदा मित्र’ के रूप में तैयार किया गया है, जिससे वे आपात स्थिति में तुरंत बचाव कार्य कर सकें. इनकी संख्या 19 हजार से अधिक है. मगर जिला प्रशासन इस बल का लाभ नहीं उठा पा रहा.

– किसी भी पर्व से 48 घंटे पहले स्थानीय अंचलाधिकारी और थाना प्रभारी को घाटों की भौतिक जांच कर ‘सेफ्टी क्लीयरेंस’ देना अनिवार्य है. मगर इसमें लापरवाही होती है.

समाज और समुदाय की भूमिका: आत्ममंथन का समय

प्रशासनिक खामियों के अलावा, सामाजिक स्तर पर बरती जाने वाली लापरवाही भी इन हादसों की बड़ी वजह है. जब तक समुदाय अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक केवल पुलिस बल के दम पर हादसे नहीं रोके जा सकते:

 1. पूजा समितियों की जवाबदेही: शोभायात्रा निकालने वाली स्थानीय समितियों को केवल डीजे और भीड़ जुटाने पर ध्यान न देकर सुरक्षा स्वयंसेवक तैनात करने होंगे. पानी में 3 फीट से आगे किसी को न जाने देने की जिम्मेदारी समिति के युवाओं को लेनी होगी. समितियां भीड़ तो जुटा लेती हैं, मगर उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं होतीं.

 2. शोभायात्राओं में ऊंचे पाइप व झंडों पर रोक: रामनगर की घटना यह दर्शाती है कि जुलूस में स्टील या लोहे के ऊंचे पाइप लेकर चलना कितना जानलेवा साबित हो सकता है. आयोजकों को बिजली के तारों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने के नियम तय करने होंगे.

 3. बच्चों पर निरंतर निगरानी: अधिकांश घटनाओं में डूबने वाले किशोर या बच्चे होते हैं. परिजनों को यह समझना होगा कि गहरे पानी या तेज बहाव वाली नदी में बच्चों को अकेले या बिना निगरानी के न जाने दें.

 4. अक्सर एक व्यक्ति को डूबता देख उसे बचाने के लिए बिना तैराकी जाने अन्य लोग पानी में कूद पड़ते हैं और एक के बाद एक कई जानें चली जाती हैं. पानी में उतरने के बजाय किनारे से बांस, गमछा, रस्सी या प्लास्टिक गैलन फेंककर बचाना चाहिए.

आस्था जीवन का संबल है, लेकिन सुरक्षा की अनदेखी कर जान जोखिम में डालना भक्ति नहीं हो सकता. जब तक जिला प्रशासन कागजी बैठकों से निकलकर सुदूर ग्रामीण घाटों तक सुरक्षा जाल नहीं बिछाएगा और समाज खुद अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं होगा, तब तक हर साल उत्सव के गीतों के बीच परिजनों का विलाप इसी तरह गूंजता रहेगा.

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