चेतावनी फाइलों में दबी रह गई, तटबंध पानी में बह गये- 2026 के बिहार बाढ़ की असली तस्वीर

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बिहार में इस साल 24 जगहों पर तटबंधों का टूटना केवल अप्रत्याशित जलप्रवाह का नतीजा नहीं है. जहां सारण के मकेर-हैजलपुर में 20.57 करोड़ के सुरक्षा कार्यों के बावजूद तटबंध में धसान हो गया, वहीं बगहा के खैरटवा और भागलपुर के काजीकोरिया जैसे संवेदनशील स्थलों को ‘वेट एंड वॉच’ में डालकर बिना सुरक्षा के छोड़ दिया गया था. इस दोहरी प्रशासनिक विफलता के कारण आई तबाही के खिलाफ फूटे ग्रामीणों के आक्रोश ने यह साबित कर दिया कि यह आपदा प्राकृतिक से अधिक मानव-निर्मित चूकों की देन है.

इस साल सारण जिले के मकेर में इस तटबंध को बचाने के लिए 20 करोड़ से अधिक की राशि खर्च हुई थी, फिर भी तटबंध टूट गया.

सोशल मीडिया पर तीन अक्तूबर का एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो के बारे में बताया जा रहा है कि यह सारण जिले के भगवानपुर का है, जहां अभी हाल में तटबंध टूटने से मकेर प्रखंड में भीषण बाढ़ आई है. वहां जब टूटे तटबंध का निरीक्षण करने जल संसाधन विभाग के जूनियर इंजीनियर चंद्रशेखर कुमार और एसडीओ सुनील कुमार पहुंचे तो आक्रोशित लोगों ने उनके साथ धक्कामुक्की की और बदसलूकी करने की कोशिश की. लोगों का आरोप था कि तटबंधों की खराब मरम्मत की वजह से यह तटबंध टूटा है और इसके लिए विभाग के अधिकारी जिम्मेदार हैं.

अगर जल संसाधन विभाग के दस्तावेजों को देखें तो विभाग को 10 नवंबर 2025 को ही यह जानकारी थी कि गंडक तटबंध पर मकेर के पास संरचना में गंभीर दिक्कत है. 10 दिसंबर, 2025 को वहां 20.57 करोड़ रुपये की लागत के अनुमान पर 29 नए बेडबार, 300 मीटर में पोर्क्युपाइन स्क्रीन, गैबियन टो, जियोबैग पिचिंग और 30 मीटर चौड़ी पुरानी धार को सक्रिय करने की व्यापक स्वीकृति प्रदान की गई थी. यह कार्य बाढ़ पूर्व अवधि में पूरा कराया जाना था. विभाग के अनुसार यह कार्य करा भी लिया गया था, मगर इसके बावजूद 30 सितंबर 2026 को इस महत्वपूर्ण चैनेज पर तटबंध में लगभग 8 मीटर का धसान हुआ. इसके परिणामस्वरूप आई भीषण बाढ़ से कई पक्के मकान ढह गये, 25 हजार से अधिक लोग प्रभावित हुए और फसलों व दुधारू पशुओं का भारी नुकसान हुआ; जनहानि के सटीक आंकड़ों की अभी आधिकारिक पुष्टि प्रतीक्षित है. ऐसी भीषण तबाही के बीच जान-माल के भारी नुकसान से उपजा ग्रामीणों का रोष स्वाभाविक था, हालांकि ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मियों के साथ धक्का-मुक्की भी कानून और व्यवस्था के नजरिए से गंभीर चिंता का विषय है.

इसके साथ ही यह सूचना भी मिलती है कि पानापुर में भी तटबंध कमजोर था, मगर चेतावनी के बाद भी वहां आवश्यक सुरक्षा कार्य समय पर धरातल पर नहीं उतर सके. यह मामला भी इसी विफलता से जुड़ा प्रतीत होता है.

सारण जिले के पानापुर में जल संसाधन विभाग के अभियंता को पानी में गिराने की कोशिश करते लोग.

मगर इस साल का यह इकलौता मामला नहीं है. साल 2026 में कम से कम 15 तटबंधों के 24 जगहों पर टूटने की सूचना सामने आई है. इन तटबंधों को सुरक्षित रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी जल संसाधन विभाग की है. इसके लिए अमूमन पिछले साल के अक्तूबर महीने से ही सर्वेक्षण का कार्य शुरू हो जाता है. फिर टेक्निकल एडवाइजरी कमिटी (टीएसी) में इनके मरम्मत व कटाव-निरोधक कार्यों का प्रस्ताव रखा जाता है. इसके बाद दिसंबर तक स्वीकृति मिलने पर बचाव कार्य आरंभ होता है.

इस साल जिन 24 जगहों पर 15 तटबंध टूटे हैं, उनमें कम से कम 9 तटबंध ऐसे हैं जहां के संभावित खतरे के बारे में विभाग पहले से अवगत था. विभाग ने इनमें से चार जगहों पर सुरक्षा कार्य कराने की स्वीकृति दी थी और शेष पांच जगहों को ‘वेट एंड वाच’ (सतत निगरानी) की श्रेणी में रखा था. मगर जमीनी नतीजे बताते हैं कि पूर्व सूचना के बावजूद इन जगहों पर कटाव और तटबंध टूटने की घटनाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सका. चार स्थलों पर सुरक्षा कार्य स्वीकृत होने के बाद भी विफलता हाथ लगी, वहीं पांच स्थलों पर पूर्व चेतावनियों के बावजूद ठोस सुरक्षात्मक कार्य नहीं हो सके.

जिन चार जगहों पर सुरक्षा कार्य होने के बावजूद तटबंध टूटे, वे ये हैं-

  1. मकेर-हैजलपुर, सारण (गंडक तटबंध, किमी 46.550 से 48.030) – 30 सितंबर 2026 को लगभग 8 मीटर का धसान.
  2. नवगछिया, भागलपुर (इस्माइलपुर-बिंदटोली गंगा तटबंध) – सितंबर 2026 के मध्य में नवगछिया परिक्षेत्र में तीन स्थानों पर दरारें आईं और तटबंध क्षतिग्रस्त हुआ.
  3. चंपारण तटबंध, पश्चिम चंपारण (गंडक बेसिन – विभिन्न चैनेज) – 29-30 सितंबर 2026 को अत्यधिक जलदबाव के कारण इन चैनेज पर आठ जगह तटबंध टूटे.
  4. धनरूआ, पटना (दरधा नदी माइनर बांध) – 3 सितंबर 2026 को 20 से 25 फीट तक बांध टूटने की घटना घटी.

इनके अलावा पांच जगहें ऐसी हैं, जहां पूर्व संज्ञान के बावजूद विभाग स्तर पर समय रहते सुरक्षा कार्य स्वीकृत नहीं किए गए और उन्हें निगरानी में रखा गया-

  1. खैरटवा, बगहा, पश्चिम चंपारण (गंडक बायां किनारा) – 28 सितंबर 2026 को खैरटवा में लगभग 10 मीटर तटबंध टूटा.
  2. राघोपुर-काजीकोरिया, भागलपुर (गंगा तटबंध) – 24 अगस्त 2026 को राघोपुर-काजीकोरिया तटबंध का करीब 30 मीटर हिस्सा कटकर बह गया.
  3. पानापुर, सारण (गंडक तटबंध) – 1 अक्टूबर 2026 को पानापुर क्षेत्र में गंडक तटबंध क्षतिग्रस्त हुआ.
  4. उतरथू, नालंदा (जीराइन एवं सोयबा नदी तटबंध) – 3-4 सितंबर 2026 को उतरथू में लगभग 3 मीटर का ब्रीच हुआ.
  5. टीके तटबंध, नवगछिया (कोसी बेसिन-मदरौनी ब्रीच पॉइंट) – 10 सितंबर 2026 की देर रात 15 मीटर का हिस्सा बह गया.

(ये तमाम विवरण जल संसाधन विभाग और अन्य आधिकारिक स्रोतों से संकलित सूचनाओं पर आधारित हैं.)

बाढ़ के भीषण हालात

इन तथ्यों से स्पष्ट है कि राज्य में इस साल 15 तटबंधों में जहां 24 जगह टूट हुई, उनमें से नौ तटबंधों के 18 संवेदनशील स्थलों के बारे में विभाग को पिछले साल नवंबर से ही तकनीकी जानकारी थी, फिर भी व्यापक नुकसान को टाला नहीं जा सका.

इसके अलावा जिन छह तटबंधों में टूट हुई और वे पूर्व तकनीकी प्राथमिकताओं में दर्ज नहीं थे, वे ये हैं—

नालंदा के जीराइन नदी पर उतरौथू और औंदा में 3-4 सितंबर के बीच हुई टूट; पटना में पुनपुन नदी पर बने कुरा रिंग बांध और बड़हियाकोल जमींदारी बांध, जहां पांच से आठ सितंबर के बीच टूट हुई; तथा 4-5 सितंबर के बीच सारण जिले में माही तटबंध का टूटना (जिसकी वर्ष 2025 में लगभग 2.7 करोड़ की लागत से मरम्मत की गई थी). यदि इनकी कमजोर स्थिति का समय रहते आकलन नहीं किया जा सका, तो यह भी बाढ़ प्रबंधन प्रणाली की खामी की ओर ही इशारा करता है.

इन तथ्यों से जाहिर है कि साल 2026 में, जब कम से कम तीन चरणों में आई बाढ़ से तकरीबन 60 लाख लोग प्रभावित हुए हैं, यह संकट सिर्फ अप्रत्याशित जलप्रवाह की प्राकृतिक आपदा नहीं जान पड़ता. परिस्थितियां दर्शाती हैं कि संरचनात्मक सुरक्षा और विभागीय निगरानी के स्तर पर भी गंभीर चूक हुई है.

नासा ने जारी की गंडक बाढ़ की सेटेलाइट इमेज

फील्ड इंजीनियरों पर कार्रवाई

लगातार उठते सवालों और जमीनी आक्रोश को देखते हुए विभाग ने कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता और कनीय अभियंता स्तर के सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया है. निलंबित किए गए अभियंता मुख्य रूप से गंडक परिक्षेत्र (विशेष रूप से बाढ़ नियंत्रण प्रभाग, छपरा, गोपालगंज और बगहा) से संबद्ध हैं. प्रथम दृष्टया यह कार्रवाई निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की अनदेखी और तटबंध की वास्तविक स्थिति से उच्चाधिकारियों को समय पर अवगत न कराने के आधार पर मानी जा रही है. हालांकि यह कदम तात्कालिक प्रशासनिक जवाबदेही तो तय करता है, लेकिन कई बुनियादी नीतिगत सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं:

  1. क्या तटबंध सुरक्षा और कार्यों की गुणवत्ता की पूरी जिम्मेदारी केवल फील्ड इंजीनियरों की है?
  2. क्या उस ‘क्वालिटी कंट्रोल’ और ‘उड़नदस्ते’ की निगरानी भूमिका की भी समीक्षा होगी, जिनके सत्यापन के बाद कार्यों को मंजूरी दी गई थी?
  3. क्या तकनीकी सलाहकार समिति (टीएसी) द्वारा खैरटवा और पानापुर जैसे बेहद संवेदनशील स्थलों को सुरक्षा कार्य स्वीकृत करने के बजाय ‘वेट एंड वाच’ श्रेणी में रखने के निर्णय का वस्तुनिष्ठ पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा?

प्राकृतिक दबाव और रिकॉर्ड डिस्चार्ज
से हुआ नुकसान– चंद्रशेखर सिंह

इस संबंध में जब बिहार क्रोनिकल ने जल संसाधन विभाग के सचिव चंद्रशेखर सिंह से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने कहा, मैंने फील्ड में अपना पक्ष साफ कर दिया है, उसे ही मेरा जवाब माना जाना. उनके फील्ड के बयानों को जुटाने पर उनका पक्ष समझ आता है कि वे अभी भी विभाग के कामकाज के बदले प्राकृतिक आपदा को दोष देते हैं. वे कहते हैं,

* रिकॉर्ड जलप्रवाह मुख्य वजह: नेपाल और वाल्मीकि नगर बराज से आए अप्रत्याशित डिस्चार्ज (6 लाख क्यूसेक से अधिक) के भारी हाइड्रोलिक दबाव और ओवरटॉपिंग के कारण तटबंधों को नुकसान पहुंचा, न कि काम के अभाव में.

 * मकेर-हैजलपुर पर सफाई: सारण तटबंध पर पहले कराये गये बेडबार व सुरक्षात्मक कार्यों ने नदी के सीधे वेग को रोका; यदि वे काम न होते, तो मुख्य बांध बहुत पहले ही बह जाता.

 * ‘वेट एंड वॉच‘ पर तर्क: नदी के बदलते रुख को देखते हुए हर बिंदु पर पक्का निर्माण संभव नहीं होता; ऐसे स्थलों को बाढ़ के दौरान आपातकालीन ‘फ्लड-फाइटिंग‘ के भरोसे रखा गया था.

 * लापरवाही पर कार्रवाई: फील्ड गश्ती और कार्य में शिथिलता बरतने वाले अभियंताओं पर निलंबन की कार्रवाई की गई है और तकनीकी विफलता की विस्तृत जांच कराई जा रही है.

 * हमले पर प्रतिक्रिया: उन्होंने सारण में इंजीनियरों के साथ बदसलूकी को अनुचित बताते हुए कहा कि विषम परिस्थितियों में जान जोखिम में डालकर काम कर रहे कर्मियों पर हमला राहत कार्यों को प्रभावित करता है.

जिम्मेदार कर्मचारियों के वक्तव्य सार्वजनिक किए जाने चाहिए ताकि कहां कमी रह गई उसे सुनिश्चित किया जा सके- दिनेश कुमार मिश्र

बिहार के बाढ़ औऱ सुखाड़ पर कई किताबें लिख चुके डॉ. दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, बाढ़ से बचाव के लिए नदियों के किनारे तटबंध बनाए जाने का काम सदियों से हो रहा है और उनके टूटने का भी एक लंबा इतिहास रहा है. हमारे ही देश में ही नहीं, अमेरिका और चीन जैसे सामर्थ्यवान देशों में भी होता है. इससे बचने के लिए वर्षा के पहले, वर्षा के समय यहां तक कि वर्षा समाप्त होने के कुछ समय बाद बाद तक इन पर विभाग और उसके कर्मचारियों का सजग रहना बहुत जरूरी है.

तटबन्धों की ऐसे समय में निगरानी रखना, उनसे हो रहे पानी के रिसाव, तटबन्धों पर वर्षाकाल में उनके भीतर और बाहर से पड़ रहे पानी के दबाव पर नज़र रखना बहुत ही जरूरी है. ऐसी जगहों पर जो सूचना देने के लिए जो सामयिक कर्मचारी नियुक्त किये जाते हैं उनको उनकी जिम्मेदारी समझाने के लिए जो ट्रेनिंग और दायित्व दिया जाता है उसकी समुचित जानकारी उन्हें हो यह सुनिश्चित करना जरूरी है. आजकल संचार व्यवस्था में बहुत सुधार हो चुका है इसलिए यह काम मुश्किल नहीं है.

कमजोर स्थलों के बारे में पूरी जानकारी और उसका प्रचार प्रसार उन लोगों के बीच आवश्यक है जो विपरीत परिस्थितियों में आक्रांत हो सकते हैं. ऐसे स्थलों पर नावों की व्यवस्था, किसी भी दुर्योग से निपटने की व्यवस्था, विशेषकर तटबन्धों से हो रहे रिसाव के बारे में सूचना का अग्रिम प्रसारण बहुत आवश्यक है. किसी भी सम्भावित दुर्घटना की अग्रिम जानकारी और उसका समय-समय पर प्रसारण आवश्यक है ताकि सम्भावित भुक्तभोगी अपने को तैयार था सकें.

इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों के वक्तव्य सार्वजनिक किए जाने चाहिए ताकि कहां कमी रह गई उसे सुनिश्चित किया जा सके और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो इसके उपाय किए जा सकें.

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