दो मौतें, दर्जनों की नदी में छलांग: बेहरावां चकिया में पुलिस कार्रवाई पर क्यों उठ रहे सवाल?

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पटना जिले के बेहरावां चकिया में पुलिस से बचने के लिए दर्जनों लोगों का पुनपुन नदी में कूदना और दो लोगों की मौत कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यह सिर्फ शराबबंदी लागू करने का मामला नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई, नागरिकों के अधिकार और राज्य की जवाबदेही से जुड़ा सवाल भी है। सवाल उठ रहे हैं कि पुलिस की कार्रवाई क्या कानून के दायरे में थी?

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अनिल मांझी के पिता की पुलिस कार्रवाई के दौरान नदी में डूबने से मौत हो गई. वे आरोप लगाते हैं कि उनके पिता को पुलिस ने मारपीट कर नदी में फेंक दिया

पटना से करीब 25 किलोमीटर दूर पुनपुन नदी के किनारे बसे बेहरावां चकिया गांव में चार अक्टूबर की सुबह जो हुआ, उसकी चर्चा अब भी गांव में है। यही पुनपुन नदी है, जहां पितृपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोग पितरों का तर्पण करने पहुंचते हैं।

गांव के एक पेड़ के नीचे अनिल मांझी बैठे हैं। सिर मुंडा हुआ है, शरीर पर मरकीन की धोती है और पास में लोहे की छड़ और पीतल का लोटा रखा है। वे अपने पिता रामू मांझी का श्राद्ध कर रहे हैं।

अनिल बताते हैं कि चार अक्टूबर को जितिया के पारण के दिन सुबह करीब साढ़े नौ बजे पुलिस गांव में शराब की छापेमारी करने पहुंची थी। उनके मुताबिक, बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी गांव में आए और घरों में घुसकर लोगों को पीटना शुरू कर दिया। डरकर कई महिलाएं खेतों की तरफ भागीं और कई युवक पुनपुन नदी में कूद गए।

अनिल का आरोप है कि उनके 68 वर्षीय पिता रामू मांझी भाग नहीं सके। पुलिस ने उन्हें पीटा और नदी में फेंक दिया। 16-17 साल के आकाश कुमार के साथ भी ऐसा ही किए जाने का आरोप है। दोनों की बाद में नदी से लाश बरामद हुई।

एक वीडियो के स्क्रीनशॉट से घटना का यह दृश्य मिला है

सामान्य छापेमारी नहीं, पुलिस का अत्याचार था- ग्रामीण

ग्रामीणों का आरोप है कि यह सामान्य शराब छापेमारी नहीं थी, बल्कि पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया। पुलिस इन आरोपों से इनकार करती है और कहती है कि वह अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई करने गई थी।

गांव के सुरेंद्र मांझी शराब बनाने की बात स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं, “ठीक बात है कि हमलोग दारू चुलाते हैं। दूसरा काम आता नहीं तो क्या करें।”

उनका कहना है कि पुलिस शराब जब्त करे, लोगों को गिरफ्तार करे, इस पर उन्हें आपत्ति नहीं है। लेकिन उनका सवाल कार्रवाई के तरीके को लेकर है। उनके मुताबिक, पुलिस घरों में घुसी, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया और युवाओं को पीटा। इसी डर से लोग नदी में कूदे।

बेहरावां चकिया में अवैध शराब बनना कोई छिपी हुई बात नहीं है। गांव के लोग खुद इसे स्वीकार करते हैं। उनका सवाल शराब के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नहीं, बल्कि कार्रवाई के तरीके को लेकर है।

इसकी पुष्टि आसपास के गांवों में भी होती है। बेहरावां चकिया से सटे नेमा गांव में मिले दो लोगों ने बताया कि इस इलाके में शराब बनना और पुलिस की दबिश कोई नई बात नहीं है। लेकिन पिछले दिनों जिस तरह भारी पुलिस बल के साथ कार्रवाई हुई, वैसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।

यानी शराब के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई होती रही है, लेकिन चार अक्टूबर को जिस तरह बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी पहुंचे और गांव में कार्रवाई हुई, वह सामान्य दबिश से अलग थी। सवाल शराब के अवैध कारोबार के अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उस दिन पुलिस कार्रवाई के तरीके और उसके बाद पैदा हुई असामान्य स्थिति पर है।

गांव के पास अभी भी नजर आती हैं शराब की भट्ठियां.

क्या नाबालिग बच्चों को भी अपने साथ ले गई पुलिस?

गांव की कई महिलाओं का कहना है कि पुलिस उनके बच्चों और नाबालिगों को भी साथ ले गई। उषा देवी बताती हैं कि उनकी 14 साल की पोती सुहानी को पुलिस ले गई। मेला देवी का कहना है कि उनका 12 साल का पोता भी पुलिस के साथ गया और बाद में उन्हें पता चला कि उसे फुलवारी जेल भेज दिया गया है।

मामले के जांच अधिकारी शशि कुमार इन आरोपों से इनकार करते हैं। उनका कहना है कि पुलिस ने 28 महिलाओं और 11 पुरुषों समेत कुल 39 लोगों को गिरफ्तार किया है। करीब 1000 लीटर शराब बरामद की गई है। सभी गिरफ्तार लोगों को बेउर जेल भेजा गया है। उनके मुताबिक, इनमें कोई नाबालिग नहीं था।

शशि कुमार का कहना है कि पुलिस जब गांव में पहुंची तो ग्रामीणों ने पहले भी पुलिस टीम पर हमला किया था। पुलिस की गाड़ियों के शीशे तोड़े गए थे और तीन पुलिसकर्मी घायल हुए थे, जिनमें एक महिला पुलिसकर्मी भी थीं। उनका कहना है कि एक और दो अक्टूबर को भी पुलिस ने गांव में छापेमारी की थी।

लेकिन गांव के वार्ड सदस्य सुजीत कुमार इस पूरे घटनाक्रम को पिछले कुछ दिनों से चल रहे पुलिस और ग्रामीणों के तनाव से जोड़ते हैं।

पुलिस और बेहरावां गांव के लोगों के बीच पुरानी अदावत के संकेत

उनका कहना है कि एक अक्टूबर की रात करीब साढ़े नौ बजे पुलिस सीधे गांव में पहुंची और लोगों के साथ गाली-गलौज की। ग्रामीणों को लगा कि कोई चोर आया है और उन्होंने पुलिस को खदेड़ दिया। दो अक्टूबर की शाम करीब साढ़े चार बजे पुलिस फिर पहुंची। सुजीत का आरोप है कि उस दौरान एसआई नीतीश कुमार और सतीश कुमार ने रिवॉल्वर निकालकर गोली मारने की धमकी दी। ग्रामीणों ने फिर पुलिस को पीछे धकेल दिया।

चार अक्टूबर की घटना इसी तनाव के बाद हुई।

वार्ड सदस्य सुजीत कुमार(बायें से निचली तसवीर) और दूसरे कई ग्रामीण पुलिस पर कई गंभीर आरोप लगाते हैं.

सुजीत खुद भी शराब बनाने के मामले में आरोपी बनाए गए हैं। उनका कहना है कि उनका अपराध सिर्फ इतना था कि रामू मांझी और आकाश की मौत के बाद उन्होंने सड़क जाम किया और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई।

सुजीत का आरोप है कि 2020 में भी पुलिस उन्हें एक सुनसान जगह पर ले जाकर पीट चुकी है और झूठे ड्रग्स केस में फंसाने की धमकी दी थी। उनका कहना है कि इस बार थानाध्यक्ष प्रिंस कुमार उनसे इसलिए नाराज थे क्योंकि उन्होंने एक यूट्यूबर से बात करते हुए उनके खिलाफ शिकायत की थी।

सुजीत आरोप लगाते हैं कि थानाध्यक्ष शराब, ड्रग्स और हथियार के झूठे मामलों में लोगों को फंसाकर डराते हैं और पैसे वसूलते हैं। वे अपने पड़ोसी मछली विक्रेता सुरेश केवट और उनकी बेटी की गिरफ्तारी का उदाहरण देते हैं। उनका कहना है कि ड्रग्स के मामले में गिरफ्तारी के बाद शर्मिंदगी के कारण सुरेश केवट के बेटे ने आत्महत्या कर ली।

सुजीत अनत्थू गुप्ता की गिरफ्तारी और रवि मांझी की गिरफ्तारी का भी उदाहरण देते हैं। उनका दावा है कि रवि को बाद में पैसे देने के बाद छोड़ दिया गया।

इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन बिहार क्रोनिकल ने इन आरोपों को लेकर थानाध्यक्ष प्रिंस कुमार से भी बात की।

मैंने किसी को नदी में कूदते नहीं देखा-थाना प्रभारी प्रिंस कुमार

चार अक्टूबर को प्रिंस कुमार सरकारी काम से पटना में थे। फोन पर उन्होंने कहा कि पुलिस की टीम सिर्फ अवैध शराब जब्त करने गई थी। पुलिस ने किसी के साथ मारपीट नहीं की और न ही किसी को नदी में फेंका। उनका कहना है कि लोगों ने नदी में कब और क्यों छलांग लगाई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। पुलिस ने किसी को नदी में कूदते हुए नहीं देखा।

प्रिंस कुमार के मुताबिक, गांव और नदी किनारे का इलाका काफी लंबा है और वहां शराब बनाने का काम अलग-अलग जगहों पर हो रहा था। इसी वजह से कार्रवाई में करीब छह से सात घंटे लगे। उनका कहना है कि कुल 39 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें 28 महिलाएं थीं।

पुलिसिया बर्बरता का इल्जाम इसी पिपरा थाना के पुलिस कर्मियों पर लगा है, यह थाना खुद भवनहीन है और एक बैटरी की फैक्टरी में किराये पर चलता है.

महिलाओं की गिरफ्तारी पर उनका कहना है कि शराब बनाने के काम में महिलाएं भी शामिल थीं और पुलिस की गाड़ियों को नुकसान पहुंचाने तथा पुलिस टीम पर हमला करने में भी कुछ महिलाएं शामिल थीं। नाबालिगों की गिरफ्तारी से उन्होंने साफ इनकार किया।

सुजीत कुमार और दूसरे ग्रामीणों द्वारा लगाए गए झूठे मुकदमे और पैसे की वसूली के आरोपों पर प्रिंस कुमार कहते हैं, “आरोप तो कुछ भी लगाया जा सकता है।” उनका कहना है कि वे शराब और ड्रग्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहे हैं और इसी वजह से लोग उनके खिलाफ आरोप लगा रहे हैं।

भाकपा माले इसे घटना के खिलाफ कर रहा प्रदर्शन

बेहरावां चकिया भाकपा माले के प्रभाव वाला इलाका भी है। गांव में पूर्व मुखिया और कॉमरेड बिजेंद्र प्रसाद का स्मारक बना हुआ है। उनकी हत्या 28 दिसंबर 2004 को हुई थी। नौ साल बाद 28 सितंबर को भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने उनकी प्रतिमा का अनावरण किया था।

भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल का कहना है कि पुनपुन नदी के किनारे रहने वाले गरीब मुसहर समुदाय के बीच लंबे समय से शराब बनाना आजीविका का हिस्सा रहा है। उनका कहना है कि पुलिस को इसे सिर्फ शराब माफिया की तरह देखने के बजाय इसके सामाजिक और आर्थिक कारणों को भी समझना चाहिए।

कुणाल का आरोप है कि चार अक्टूबर को पुलिस ने दो लोगों को पीटकर नदी में फेंक दिया और महिलाओं के साथ भी दुर्व्यवहार किया। उनका यह भी कहना है कि नदी में कूदे लोगों पर पुलिस ने पत्थर फेंके। भाकपा माले ने इस घटना के विरोध में आठ अक्टूबर को प्रदर्शन की घोषणा की है।

बेहरावां गांव के ठीक पहले भाकपा माले के एक शहीद का स्मारक बना है

हालांकि, इस पूरे मामले में एक सवाल ऐसा है, जिसका जवाब सिर्फ शराबबंदी के कानून या पुलिस और ग्रामीणों के बीच पुराने विवाद से नहीं मिलता।

पुलिस अगर अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई कर रही थी तो आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी कि दर्जनों लोगों को अपनी जान बचाने के लिए नदी में कूदना पड़ा? क्या वहां मौजूद पुलिस बल और ग्रामीणों के बीच ऐसा भय या टकराव पैदा हुआ था, जिसकी परिणति दो लोगों की मौत में हुई?

एक तरफ पुलिस अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई और अपने ऊपर हुए हमले का हवाला दे रही है। दूसरी तरफ ग्रामीण पुलिस की कार्रवाई को डर और हिंसा से जोड़ रहे हैं। इनके बीच वह असामान्य तथ्य मौजूद है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है—पुलिस की कार्रवाई के दौरान दर्जनों लोग जान बचाने के लिए पुनपुन नदी में कूद गए और दो लोगों की जान चली गई।

रामू मांझी और आकाश कुमार की मौत की परिस्थितियों, पुलिस और ग्रामीणों के आरोपों तथा उस दिन हुई कार्रवाई की स्वतंत्र जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि चार अक्टूबर को पुनपुन नदी के किनारे वास्तव में क्या हुआ था।

“10” पर दो मौतें, दर्जनों की नदी में छलांग: बेहरावां चकिया में पुलिस कार्रवाई पर क्यों उठ रहे सवाल? के विचार

  1. पुलिस बर्बरतापूर्ण कारवाई करती है।इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है।परंतु जो लोग शराब के अवैध धंधे में जुड़े हैं,वे कम आक्रामक नहीं रहते हैं।अगर पुलिस का हफ्ता समय से पहुंचता,तो शायद यह कुछ नहीं होता।

  2. बिहार पुलिस की बर्बरता नई बात नहीं है। नीतीश और अब बी जे पी के शासन में यह और बढ़ता जा रहा है। शराबबंदी के नाम पर केवल गरीब और दलित-पिछड़ों के साथ पुलिस ने बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की है। किसी शराब माफिया के खिलाफ कार्रवाई होते नहीं सुना गया। दरअसल, बिहार की सत्ता और उसकी पुलिस निरंकुश हो चुके हैं। आने वाले दिनों में यह और तीव्र होगा।

  3. गांव वाले स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि पुलिस को मालूम है कि इस गांव में लोग शराब बनाते हैं और ये निरंतर हो रहा है पुलिस आती है पकड़ती है और फिर शराब बनने लग जाती है। कहीं ये बात इस ओर इशारा तो नहीं करती कि बार बार दबिश के बावजूद ग्रामीण शराब बनाना छोड़ नहीं रहे और इसी बात का गुस्सा पुलिस बल ने ग्रामीणों पर उतार दिया हो। वैसे बार बार यही काम होना एक तरफ ये भी इशारा करता है कि ये सारा काम पुलिस की मिलीभगत से ही हो रहा है।

    1. आपकी बात बिल्कुल सही है. मगर सवाल फिर भी है कि क्या पुलिस की सख्ती से यह खत्म हो जायेगा? जैसा कि कुणाल कह रहे हैं, यह सामाजिक मसला है, इसे उसी तरह हल किया जाना चाहिए. मैं भी इस बात का पक्षधर हूं.

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