बड़े वेतन घोटाले की आहट, कहीं वेतन बढ़ाया, कहीं एचआरए तो कहीं फर्जी कर्मी को दे डाली सैलरी
बिहार में सरकारी कर्मचारियों के वेतन भुगतान की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. कहीं फर्जी एंट्री के जरिए सरकारी रकम निकालने का मामला है, तो कहीं कर्मचारियों के वास्तविक वेतन से कई गुना अधिक भुगतान सामने आया है. क्या यह महज लापरवाही है या सरकारी सिस्टम में साइबर फ्रॉड की सेंध?
पहले जरा इन उदाहरणों को देखिये, फिर हम अपनी बात शुरू करते हैं-
- पटना सिटी के फतेह नारायण सिंह एकेडमी स्कूल के लिपिक विजय कृष्ण विद्यार्थी का वेतन 86,681 रुपये है, मगर नवंबर 2024 से अप्रैल 2025 तक उसके खाते में हर माह 9.81 लाख का भुगतान किया गया.
- सुपौल जिले के एक लिपिक एहतेशामुल हक ने साफ्टवेयर में 11 काल्पनिक शिक्षकों की एंट्री की और इनके वेतन के नाम पर 1.83 करोड़ निकाल कर अपनी मां और सास के खाते में ट्रांसफर कर दिये.
- पटना, गया और मुजफ्फरपुर में सिपाही से लेकर दारोगा तक दर्जनों पुलिसकर्मियों के खाते में महीनों तक दोहरा और तिहरा वेतन जाता रहा. किसी पुलिसकर्मी का तबादला भी हो गया तो भी उसके खाते में पुरानी जगह से भी वेतन जाता रहा, नई जगह से तो मिलता ही रहा.
- छपरा में जनवरी, 2025 से अक्तूबर, 2026 के बीच तीन शिक्षकों आलोक कुमार, मनोरमा कुमारी और सौरभ कुमार के खाते में 8.84 लाख से अधिक की अतिरिक्त रकम भेजी गई. इस मामले में डाटा एंट्री ऑपरेटर राजीव कुमार को हिरासत में लिया गया है.
इन उदाहरणों को देखिये और समझिये कि बिहार सरकार के एकाउंटिंग के सिस्टम में कितने बड़े-बड़े लूपहोल्स हैं. ये मामला किसी एक जगह का नहीं है. पूरे बिहार में एक ही तरीके से इसे अंजाम दिया जा रहा है, यानी मोडस अपरेंडी सबको मालूम है. ऐसे में आप अनुमान भी नहीं लगा सकते कि इस मामले में कितना बड़ा हेरफेर हुआ होगा. और हेराफेरी के इस पूरे मामले का अंदाजा बिहार सरकार को भी लग गया है, संभवतः इसी वजह से सरकार ने शिक्षा और गृह विभाग के 10.30 लाख से अधिक कर्मियों के वेतन भुगतान पर फिलहाल रोक लगा दी है. एक-एक कर्मी के रिकार्ड का मिलान करवाया जा रहा है, उसका वेतन कितना है और उसे भुगतान कितना हो रहा है. शिक्षा विभाग 5000 शिक्षकों को संदिग्ध मानकर चल रहा है. यह किस्सा एक लापरवाह अकाउंटिंग सिस्टम और उसके भीतर सेंध लगाते डाटा एंट्री ऑपरेटरों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों के भ्रष्ट करतूतों का है.
इस पूरे कहानी की शुरुआत कैग की रिपोर्ट से होती है, जिसे बिहार विधान सभा के बजट सत्र के दौरान रखा गया था और उसमें 70 हजार करोड़ से अधिक की राशि का उपयोगिता प्रमाणपत्र न मिलने की बात कही गई थी. उस वक्त जब सरकार के लोगों से इस मसले में सवाल किया गया तो सरकार ने जवाब दिया कि उपयोगिता प्रमाण पत्र न मिलने का मतलब घोटाला नहीं होता. कई बार इन प्रक्रियाओं में देरी हो जाती है. मगर अब जब ऐसे मामले सामने आ रहे हैं तो जाहिर है कि यह सिर्फ देरी का मामला नहीं है. इसके पीछे कोई बड़ा घोटाला है, यह कितना बड़ा है, वित्त विभाग की जांच के बाद ही इसका खुलासा होगा.
फिलहाल वित्त विभाग के सचिव ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया है कि जब तक प्रत्येक कर्मचारि के सेवा कागजात और सैलरी स्लिप से शत-प्रतिशत मिलान न हो जायेगा, तब तक वेतन जारी नहीं किया जायेगा. इसके बाद अलग-अलग जिलों से कई मामले सामने आ रहे हैं. पुलिसकर्मियों के दोहरे, तिहरे वेतन और मकान किराया में गड़बड़ी का मामला भी इसी जांच के बाद सामने आया है. जगह-जगह इस घोटले में संलप्ति कर्मियों, डाटा एंट्री ऑपरेटरों और अधिकारियों के खिलाफ मामले दर्ज हो रहे हैं. पटना सिटी के आरोपित कर्मियों ने तो चेक के माध्यम से अतिरिक्त निकासी की राशि सरकारी खाते में जमा भी की है. अब समझते हैं कि कैसे इस पूरे घोटाले को अंजाम दिया गया. इसका तरीका क्या है?

फर्जीवाड़ा कैसे हुआ? समझिए वेतन भुगतान की कार्यप्रणाली
बिहार में सरकारी कर्मचारियों के वेतन भुगतान की प्रक्रिया डिजिटल हो गई है. कर्मचारी की सेवा संबंधी जानकारी और वेतन का विवरण ई-एचआरएमएस पोर्टल पर दर्ज होता है. वेतन विपत्र तैयार होने और आवश्यक स्तरों पर सत्यापन एवं मंजूरी के बाद भुगतान सीएफएमएस के जरिये किया जाता है.
सामान्य प्रक्रिया में तीन भूमिकाएं महत्वपूर्ण होती हैं- मेकर, चेकर और अप्रूवर. मेकर वेतन विपत्र तैयार करता है, चेकर उसकी जांच करता है और अप्रूवर अधिकृत मंजूरी देता है. इसके बाद भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है. इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी कर्मचारी को स्वीकृत वेतन और भत्तों के अनुरूप ही राशि मिले.
लेकिन सामने आये मामलों में इसी प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में अनियमितताओं के मामले सामने आये हैं.
1. फर्जी पे-आईडी बनाकर कर्मचारी खड़ा करना
सुपौल में 11 काल्पनिक शिक्षकों की पे-आईडी तैयार किये जाने का मामला इसी तरह की अनियमितता का उदाहरण है. ऐसे में जांच में यह भी देखा जाना चाहिये कि इन आईडी के साथ नियुक्ति पत्र, पदस्थापन आदेश, सेवा पुस्तिका और अन्य जरूरी दस्तावेज मौजूद थे या नहीं. अगर होंगे तो गड़बड़ियों का मामला और आगे जा सकता है.
2. वास्तविक वेतन से कई गुना अधिक भुगतान
दूसरा तरीका वेतन या भत्तों की प्रविष्टि में हेरफेर का है. पटना सिटी के स्कूल में लगभग 86 हजार रुपये मूल वेतन वाले लिपिक के खाते में हर महीने 9.81 लाख रुपये आने का मामला इसी श्रेणी में है.
3. भत्तों की दर में बदलाव
वेतन के अलावा मकान किराया भत्ता और अन्य अनुमन्य भत्ते भी भुगतान का हिस्सा होते हैं. इनकी दर कर्मचारी की पात्रता, पद और लागू नियमों के अनुसार तय होती है. पटना सिटी के मामले में मकान किराया को 20 प्रतिशत के बजाय 200 प्रतिशत दर्ज किये जाने की खबर सामने आई है. अन्य रिपोर्टों में भत्तों की दर में इससे भी अधिक हेरफेर के आरोप हैं.
यदि निर्धारित दर से अधिक भत्ता दर्ज किया गया, तो सवाल यह है कि सिस्टम में अधिकतम सीमा क्यों लागू नहीं थी और सत्यापन करने वाले अधिकारियों ने इस अंतर को क्यों नहीं पकड़ा.
4. पहले भुगतान हो चुकी राशि का दोबारा विपत्र
सुपौल के मामले में पहले भुगतान हो चुके वेतन और बकाया राशि के लिए दोबारा विपत्र तैयार करने का आरोप है. जांच में मृत एवं सेवानिवृत्त शिक्षक अब्दुल मन्नान के नाम पर पहले भुगतान की जा चुकी बकाया राशि के लिये फिर से विपत्र बनाकर 2.39 लाख रुपये से अधिक भुगतान किए जाने का भी उल्लेख है.
यहां जांच का मुख्य बिंदु है कि पहले भुगतान का रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद उसी मद में दोबारा भुगतान कैसे स्वीकृत हुआ. यदि सिस्टम पुराने विपत्रों से मिलान नहीं करता या दोहरे भुगतान पर रोक नहीं लगाता, तो ऐसी गड़बड़ी लंबे समय तक चल सकती है.
5. सरकारी रकम रिश्तेदारों के खातों में भेजना
सुपौल मामले में राशि लिपिक के परिजनों के बैंक खातों में भेजी गई. यह जांचना जरूरी है कि संबंधित खातों को किस प्रक्रिया से सिस्टम में जोड़ा गया, लाभार्थी के बैंक विवरण का सत्यापन किसने किया और भुगतान की मंजूरी किस स्तर पर मिली.
6. तबादले के बाद भी पुराने कार्यालय से वेतन
पुलिस विभाग में वेतन भुगतान से जुड़ी एक दूसरी तरह की विसंगति भी सामने आई है. तबादले के बाद नये जिले से वेतन शुरू होने पर यदि पुराने जिले की वेतन प्रविष्टि बंद नहीं होती, तो कर्मचारी के खाते में एक ही अवधि के लिए दो जगह से भुगतान हो सकता है.
इस तरह की गड़बड़ी में संबंधित कर्मचारी की भूमिका भी अलग से जांचनी होगी. अतिरिक्त भुगतान की जानकारी होने, उसकी सूचना देने और रकम लौटाने से जुड़े तथ्य जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण होंगे.

मेकर, चेकर और अप्रूवर की भूमिका की जांच जरूरी
वैसे तो इन मामलों में सबसे गंभीर आरोप डाटा एंट्री ऑपरेटरों पर हैं, जो संविदा पर बहाल होते हैं और कहा जाता है कि उन्हें अपनी नौकरी का बहुत भय नहीं होता, इसलिए वे बेखौफ होकर ऐसी गड़बड़ियों को अंजाम देते हैं. मगर किसी ऑपरेटर या लिपिक की भूमिका की जांच पर्याप्त नहीं होगी. यदि किसी ने गलत डेटा दर्ज किया, तो यह देखना होगा कि उसकी जांच किसने की और भुगतान किसने मंजूर किया. यही वजह है कि वित्त विभाग ने वेतन भुगतान में अनियमितता पाए जाने पर मेकर, चेकर और अप्रूवर के स्तर पर जिम्मेदारी तय करने तथा अतिरिक्त राशि की वसूली के निर्देश दिये हैं.
यह भी जांच का विषय है कि इन जिम्मेदारियों का निर्वहन अधिकृत अधिकारियों ने किया या कहीं संविदा पर तैनात ऑपरेटरों को जरूरत से ज्यादा अधिकार दे दिये गये थे. नियमित कर्मचारियों को वेतन विपत्र तैयार करने, सत्यापन करने और मंजूरी देने की जिम्मेदारी देने पर भी जोर दिया जाना चाहिये.
क्या यह घोटाला सिर्फ आपरेटरों और कर्मियों तक सीमित है?
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “पहली बात तो इस घोटाले से यह समझ आती है कि डिटिजल सिस्टम लीक प्रूफ नहीं है. दूसरी बात, यह बिल्कुल नहीं माना जा सकता कि इसमें सिर्फ डाटा एंट्री ऑपरेटर शामिल हैं. क्योंकि बिना उच्च अधिकारियों की सहमति और संरक्षण के ऐसे घोटाले नहीं हो सकते. यह पूरे राज्य में हो रहा है, इसका मतलब भ्रष्टाचार का इको सिस्टम तैयार है. अभी सरकार सिर्फ निम्न वर्गीय कर्मियों और अधिकारियों की जांच कर रही है. मगर उसे समझना होगा कि इस सिस्टम को संरक्षण कहां से मिल रहा है.”
वे कहते हैं, “अभी तो हमें सिर्फ इतना पैसा कहां जा रहा है और किसकी इजाजत से जा रहा है. हमें यह भी पता करने की जरूरत है कि इसमें लाभार्थी कितना कट दे रहा है और कट मनी कहां तक पहुंच रहा है. इसलिए बेहतर हो कि इस पूरे मामले की जांच सीबीआई से करवाई जाये.”
क्या कहते हैं वित्त मंत्री?
इस पूरे मामले पर टिप्पणी करते हुए वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा है, “सीएजी की रिपोर्ट के आलोक में शिक्षा और गृह विभाग में अधिक वेतन निकासी के मामले सामने आये हैं. विभाग इसकी जांच करा रहा है. ऐसे में जांच पूरी होने तक दोनों संबंधित विभागों के 10.30 लाख कर्मियों का वेतन भुगतान रोक दिया गया है.”
हरेक प्रखंड के प्रखंड संसाधन केंद्र में एक एकाउंटेंट भी है।इनकी भी भूमिका होगी।
शिक्षा विभाग में वेतन को छोड़ कर किसी भी राशि के भुगतान के लिए वेंडर सिस्टम बनाया गया है।इसमें 8% से 20 % तक केवल बिल देने का कमीशन है।