विधान परिषद का एलीट क्लब – दलित, अति पिछड़े और स्त्रियों के लिए दरवाजा कितना खुला?
बिहार विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की आठ सीटों पर 23 अक्तूबर को चुनाव होना है। ये सीटें कभी समाज के खास तबकों को प्रतिनिधित्व देने की संवैधानिक कोशिश के तौर पर बनी थीं, लेकिन इनके करीब ढाई दशक के चुनावी रिकॉर्ड में महिलाओं और दलितों की मौजूदगी लगभग गायब है। अति पिछड़ों की पहुंच भी एक अपवाद तक सिमटी दिखती है—तो सवाल यह है कि विशेष प्रतिनिधित्व की यह व्यवस्था आखिर किसके लिए कितनी खुली है?
इन दिनों बिहार में 23 अक्तूबर को होने वाले विधान परिषद की आठ सीटों को लेकर सरगर्मियां तेज हैं. चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदान होने हैं. यह एक खास तरह का चुनाव है, जिसके लिए मतदाता भी खास हैं और प्रतिनिधित्व का दावा भी खास है. इसको लेकर राजनीति है, गणित है, टिकट बंटे हैं. बिसात बिछाई जा रही है. मगर मौजूदा उम्मीदवारों की सूची में सवर्ण और पिछड़े पुरुष तो नजर आ रहे हैं. मगर दलित, अति पिछड़े और महिलाएं आज भी इस खेल में हाशिये पर हैं. उनके लिए शिक्षक और स्नातक क्षेत्र के विधान परिषद सदस्य बनने का दरवाजा ठीक से खुल नहीं पा रहा.
झारखंड अलग होने के बाद बिहार विधान परिषद में छह स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से प्रतिनिधि विधान परिषद पहुंचते रहे हैं. इनके रिकॉर्ड को देखें तो दलितों और महिलाओं की संख्या शून्य नजर आती हैं. अति पिछड़ों में सिर्फ एक वंशीधर बृजवासी दिखते हैं, जो अपनी ताकत पर निर्दलीय जीत कर पिछली दफा तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत कर पहुंचे थे. ये आंकड़े साफ-साफ इशारा करते हैं कि विधान परिषद के इन आठ सीटों पर हाशिये की आबादी की पहुंच कितनी है.
ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या यह सचमुच विशेषज्ञता और अनुभव का विशेष प्रतिनिधित्व है या शिक्षा, सामाजिक स्थिति और राजनीतिक सक्रियता की असमानता के कारण यह व्यवस्था कुछ समूहों को दूसरों की तुलना में स्वाभाविक बढ़त देती है?
क्या इसकी वजह इसकी खास वोटर संरचना में है?
बिहार के चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में इस बार कुल 4,84,943 मतदाता हैं. यानी जाति जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के करीब 80 लाख स्नातकों में से बहुत छोटा हिस्सा ही इस विशेष मतदाता सूची में है. इसका एक कारण यह है कि स्नातक होना अपने आप इस मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए पर्याप्त नहीं है. संबंधित व्यक्ति को पात्रता पूरी करने के साथ अलग से पंजीकरण कराना पड़ता है. इस तरह सिर्फ छह फीसदी स्नातक ही इस सूची में शामिल होते हैं.

बिहार जाति आधारित सर्वेक्षण के शिक्षा संबंधी आंकड़ों को देखें तो सामान्य वर्ग में 13.41 फीसदी लोग स्नातक हैं. पिछड़े वर्ग में यह दर 6.77 फीसदी, अति पिछड़े वर्ग में 4.27 फीसदी और अनुसूचित जाति में 3.05 फीसदी है. संख्या के लिहाज से सामान्य वर्ग में करीब 26.96 लाख, पिछड़े वर्ग में 24.02 लाख, अति पिछड़े वर्ग में 20.09 लाख और अनुसूचित जाति में 7.83 लाख स्नातक हैं. इन चार प्रमुख सामाजिक समूहों को साथ रखकर देखें तो स्नातकों में सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी करीब 34 फीसदी बैठती है. आबादी में उसका हिस्सा करीब 15.5 फीसदी है. इसके उलट करीब 36 फीसदी आबादी वाले अति पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी इन स्नातकों में करीब 25 फीसदी और करीब 19.6 फीसदी दलित आबादी की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी है.
इसका सीधा अर्थ यह नहीं कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के 4.85 लाख मतदाताओं में भी यही अनुपात है. उसके लिए मतदाता सूची का सामाजिक वर्गीकरण चाहिए, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. मगर ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि हाशिये के लोगों में इसका वोटर बनने की तत्परता वैसी नहीं रहती होगी, इसलिए इन मतदाताओं के बीच उनका अनुपात और भी कम होगा.
इस पूरे मसले को 2020 में पटना स्नातक सीट की मतदाता के आंकड़ों से समझिये. वहां जातिवार ब्योरे तो नहीं थे. मगर जहां पुरुष मतदाता 91,598 थे मगर महिलाएं सिर्फ 28,488 थीं. यानी एक चौथाई से भी कम. ऐसे में राजनीतिक दल भी महिलाओं और वंचित जातियों को बहुत तरजीह नहीं देते.
इस बार की उपलब्ध सूची के मुताबिक एक सीट पर राजद ने और एक सीट पर जनसुराज ने महिलाओं को उतारा है. 2020 में इन आठ विशेष निर्वाचन क्षेत्रों में कुल 102 उम्मीदवार मैदान में थे. स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के 59 उम्मीदवारों में सिर्फ एक महिला थी, जबकि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के 43 उम्मीदवारों में तीन महिलाएं थीं. उसी चुनाव में स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में 3,07,363 पुरुषों के मुकाबले 1,00,480 महिला मतदाता थीं. शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में 31,694 पुरुष और 8,715 महिला मतदाता थीं.

इस वक्त राज्य में 6.9 लाख सिर्फ सरकारी शिक्षक हैं. मगर मतदाता सिर्फ 45,660 हैं. इन चुनावों में मतदाता बनने की प्रक्रिया इतनी जटिल और समझ से परे है कि आमलोग इस पर ध्यान भी नहीं दे पाते.
इस कहानी को चार सीढ़ियों में देखें
- आबादी 2. स्नातक 3. विशेष मतदाता सूची 4. निर्वाचित प्रतिनिधि।
पहली सीढ़ी पर ही सामाजिक असमानता दिखाई देती है. दूसरी सीढ़ी पर कौन-कौन लोग फॉर्म 18 भरकर मतदाता बने, उसका सामाजिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. और तीसरी सीढ़ी यानी निर्वाचित प्रतिनिधित्व में 2000 के बाद महिलाओं और दलितों की अनुपस्थिति तथा अति पिछड़े का बेहद सीमित प्रतिनिधित्व एक अलग तस्वीर सामने रखता है.
इस मसले पर जब हमने राज्य में महिला आंदोलनों से जुड़ी मीना तिवारी से बात की तो उन्होंने कहा, हमने भी खुद आपके बताने पर इन आंकड़ों पर गौर किया, यह तो परेशान करने वाला है. फौरी तौर पर इसकी वजह मुझे लगती है कि महिलाओं को प्रतिनिधित्व न मिलने की वजह एक तो यह है कि वोटरों में इनके मतदाता अपेक्षाकृत कम हैं, दूसरा वोटर कम होने के कारण यह चुनाव अमूमन धन-बल का खेल बन जाता है. इसमें महिलाएं और वंचित तबके के लोग पिछड़ जाते हैं. राजनीतिक दल भी इसलिए उन्हें टिकट नहीं देते.
महादलित परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बबन रावत कहते हैं, “यह बहुत गंभीर सवाल है, हमें लगता है कि दलितों को इसमें अलग से आरक्षण देने की जरूरत है.” मीना तिवारी भी महिला आरक्षण की जरूरत पर बल देती हैं. वहीं राष्ट्रीय अति पिछड़ा मोर्चा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी कहते हैं, पहले राजनीतिक दल आबादी के हिसाब से टिकट तो दे. इस बार शायद पहला मौका है कि दो दलों में एक-एक अति पिछड़े को टिकट दिया है.
इस पूरे मसले पर विधान परिषद के पूर्व सदस्य लेखक-विचारक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “मेरे समय में भी इन 12 सीटों पर एक को छोड़ दें तो सभी अपर कास्ट थे. इसलिए मुझे लगता रहा कि यह अपर हाउस नहीं अपर कास्ट का हाउस है. इससे उस समानता के अधिकार का भी हनन होता है, जहां एक सामान्य मतदाता एक बार वोट करता है. स्नातक दो बार और शिक्षक तीन बार वोट करता है, क्योंकि वह स्नातक भी है. मैं यह भी पूछता हूं कि शिक्षकों और स्नातकों के ही प्रतिनिधि क्यों? किसान के, लुहार और बढ़ई और नाई के क्यों नहीं? ठेला चालकों के, छात्रों के भी प्रतिनिधि रहें. राज्यसभा में भी दलित कम जा पाते हैं. ये दोनो फेक हाउस हैं. दिक्कत है कि इन सवालों पर विचार नहीं होता है. सवाल यह भी है कि कुछ ही राज्यों में विधान परिषद क्यों है? इस पर इतना खर्च है. इससे अच्छा विधान सभा में ही सीटें बढ़ा दीजिये, वहीं अलग-अलग वर्ग के प्रतिनिधियों को बुला लीजिये.”
5.30 लाख मतदाता, आठ विधायक
बिहार में इस बार स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के कुल 5,30,603 मतदाता विधान परिषद के आठ सदस्यों को चुनेंगे. यानी औसतन करीब 66 हजार मतदाता एक सदस्य को चुनेंगे. लेकिन यह औसत भी तस्वीर को पूरी तरह नहीं बताता.

चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में कुल 4,84,943 मतदाता हैं- यानी औसतन करीब 1.21 लाख मतदाता प्रति सीट. इसके मुकाबले चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में सिर्फ 45,660 मतदाता हैं—यानी एक सीट पर औसतन 11,415 मतदाता.
इसकी तुलना विधानसभा से करें. बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर औसतन करीब 3.05 लाख मतदाता प्रति सीट हैं. यानी एक सामान्य विधानसभा क्षेत्र के औसत मतदाताओं की संख्या स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगभग ढाई गुना और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से करीब 27 गुना है.
फिर भी दोनों जगह चुने गए प्रतिनिधि राज्य की विधायिका का हिस्सा होते हैं. विधान परिषद सदस्य का कार्यकाल छह साल होता है, जबकि विधानसभा सदस्य का सामान्य कार्यकाल पांच साल है.
यह सवाल सिर्फ मतदाताओं की संख्या का नहीं है. सवाल यह है कि क्या इतने छोटे और विशेष मतदाता समूह से चुने गये प्रतिनिधि को भी वही विधायी प्रतिनिधित्व हासिल है, जो लाखों सामान्य मतदाताओं से चुने गए विधानसभा सदस्य को मिलता है?
स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की ऐतिहासिक संवैधानिक वजहें रही हैं. लेकिन जब शिक्षा, मतदाता सूची और समाज की संरचना पिछले दशकों में इतनी बदल चुकी है, तब यह पूछना असंगत नहीं होगा कि इन विशेष निर्वाचन क्षेत्रों की मौजूदा व्यवस्था आज के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से कितनी प्रासंगिक है.