प्रारंभिक शिक्षकों को क्यों नहीं मिलता विधान परिषद में मत देने का अधिकार?

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बिहार ही नहीं, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी प्रारंभिक शिक्षकों की इस पात्रता का प्रश्न लंबे समय से उठता रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन छह राज्यों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के तकरीबन 5 लाख 12 हजार 7 सौ नब्बे विद्यालयों में कार्यरत लगभग 25 लाख शिक्षक, विधान परिषद में शिक्षक प्रतिनिधि चुनने के मताधिकार से वंचित हैं.

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रंजन कुमार

(लेखक- प्रारंभिक शिक्षक साझा मंच के समन्वय समिति के सदस्य और प्राध्यापक हैं)

बच्चों को संविधान, समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों का पाठ पढ़ाने वाले बिहार के अनेक प्रारंभिक शिक्षक खुद विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता बनने के अधिकार से वंचित हैं. सात दशकों से अधिक समय से लंबित यह सवाल केवल चुनावी पात्रता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में समानता का भी है. अब समय है कि इस व्यवस्था की समीक्षा हो और प्रारंभिक शिक्षकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक एवं विधायी पहल की जाए.

सात दशकों से लंबित सवाल पर छाई चुप्पी के निहितार्थ तलाशना जरूरी

प्रारंभिक शिक्षक समाज को दिशा देने और लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण और प्रारंभिक भूमिका निभाते हैं. वे बच्चों को नागरिक कर्तव्यों, मौलिक अधिकारों, संवैधानिक न्याय और समानता के मूल्य सिखाते हैं. लेकिन विडंबना यह है कि प्रारंभिक शिक्षा से जुड़े अनेक शिक्षक विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में अपने प्रतिनिधि को चुनने की विशेष व्यवस्था से बाहर रह जाते हैं.

बिहार ही नहीं, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी प्रारंभिक शिक्षकों की इस पात्रता का प्रश्न लंबे समय से उठता रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन छह राज्यों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के तकरीबन 5 लाख 12 हजार 7 सौ नब्बे विद्यालयों में कार्यरत लगभग 25 लाख शिक्षक, विधान परिषद में शिक्षक प्रतिनिधि चुनने के मताधिकार से वंचित हैं.

यह स्थिति इस सवाल को और महत्त्वपूर्ण बनाती है कि शिक्षक प्रतिनिधित्व की मौजूदा व्यवस्था में प्रारंभिक शिक्षकों की भागीदारी का रास्ता क्यों नहीं निकाला गया.

यथार्थतः इस मसले के ऐतिहासिक क्रम पर गौर करें तो पाएँगे कि यह कोई नया मुद्दा नहीं है. पब्लिक डोमेन में उपलब्ध संसदीय अभिलेखों के मुताबिक, प्राथमिक शिक्षकों को शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में शामिल करने का प्रश्न 1957 से विचाराधीन रहा है. 29 फरवरी 1964 को सांसद आर. सेझियान ने प्राथमिक एवं पूर्व-प्राथमिक शिक्षकों को मताधिकार देने के लिए संविधान संशोधन का सवाल उठाया. इसके बाद 20 अप्रैल 1966 को सांसद राम हरख यादव ने भी इस विषय को सदन में उठाया.

16 मई 1990 को राज्यसभा सदस्य मोटुरु हनुमंत राव ने प्राथमिक शिक्षकों को शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मताधिकार से वंचित रखने के प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया. 24 मार्च 2005 को संबंधित संसदीय स्थायी समिति ने प्राथमिक शिक्षकों को इस निर्वाचन व्यवस्था में शामिल करने के प्रश्न पर पुनर्विचार की सिफारिश की. हालांकि, उसी वर्ष 20 दिसंबर को तत्कालीन विधि एवं न्याय मंत्री एच. आर. भारद्वाज ने राज्यसभा में बताया कि इस विषय पर राज्यों और केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के बीच सहमति नहीं बन सकी थी और सरकार ने समिति की सिफारिश स्वीकार नहीं की थी.

5 मई 2010 को राज्यसभा में यह विषय फिर चर्चा में आया. इसी वर्ष दिसंबर में निर्वाचन सुधारों से संबंधित निर्वाचन आयोग की सिफारिश में भी संस्थानों के स्तर से जुड़ी पात्रता-सीमा पर पुनर्विचार और सभी स्तरों के शिक्षकों को शामिल करने की संभावना का उल्लेख किया गया. 28 दिसंबर 2011 को बिहार के तत्कालीन लोकसभा सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी प्राथमिक शिक्षकों को शिक्षक निर्वाचन में मताधिकार देने की आवश्यकता उठाई.

ये घटनाएँ बताती हैं कि इस सवाल पर संसदीय स्तर पर कई बार चर्चा हुई और पुनर्विचार की सिफारिशें भी सामने आईं, लेकिन अब तक कोई निर्णायक समाधान नहीं निकला है. इस ऐतिहासिक क्रम को और प्रामाणिक बनाने के लिए संबंधित संसदीय कार्यवाहियों, सरकारी पत्राचार और निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों का व्यवस्थित संकलन जरूरी है.

पात्रता के संवैधानिक आधार की  हो व्यापक समीक्षा

वर्तमान व्यवस्था में विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता बनने की पात्रता संबंधित शैक्षणिक संस्थान के स्तर और कानून में निर्धारित अन्य शर्तों से जुड़ी है. इसके कारण अनेक स्वतंत्र प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक इस विशेष निर्वाचन व्यवस्था में मतदाता नहीं बन पाते.

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने वाले प्रत्येक शिक्षक स्वतः अपात्र नहीं होते. बल्कि उनकी पात्रता संस्थान की स्थिति और लागू वैधानिक शर्तों पर निर्भर करती है. इसलिए सवाल किसी शिक्षक की योग्यता या उसके काम के महत्त्व को कमतर आँकने का नहीं, बल्कि उस संस्थागत सीमा के औचित्य का है जिसके कारण  बहुतायत प्रारंभिक शिक्षक अपने विधान परिषद प्रतिनिधि के चुनाव में भाग नहीं ले पाते.

आज प्रारंभिक शिक्षक भी विविध शैक्षणिक योग्यताओं और पेशागत प्रशिक्षण के साथ शिक्षा-व्यवस्था में योगदान दे रहे हैं. वे बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक और नागरिक विकास की नींव तैयार करते हैं. ऐसे में शिक्षक प्रतिनिधित्व की पात्रता को केवल संस्थान के स्तर से जोड़कर देखने वाली व्यवस्था की समीक्षा भी जरूरी है. क्या शिक्षक निर्वाचन में भागीदारी का आधार ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे प्रारंभिक शिक्षा में योगदान देने वाले शिक्षकों को भी न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिल सके ?

इस मुद्दे को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाने के पीछे उद्देश्य यह जानना भी है कि दशकों से लंबित इस लोकतांत्रिक मसले का समाधान आखिर क्यों नहीं निकल पाया और आगे बढ़ने के लिए कौन-से संवैधानिक तथा विधायी विकल्प उपलब्ध हैं.

संगठित पहल से माँग को आगे बढ़ाने की जरूरत

इस प्रश्न के समाधान के लिए संविधान के अनुच्छेद 171(3)(C) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 27 के प्रावधानों की समीक्षा आवश्यक है. प्रारंभिक शिक्षकों की मतदाता-पात्रता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संवैधानिक और विधायी संशोधनों की संभावनाओं पर गंभीर विचार होना चाहिए.

इसके लिए विभिन्न प्रारंभिक शिक्षक संगठनों को साझा पहल करनी होगी. उपलब्ध संसदीय अभिलेखों और संबंधित दस्तावेजों का और अधिक गहन अध्ययन के साथ जनप्रतिनिधियों के मनोभाव भी टटोलने होंगे ताकि दृष्टिगत सारे गतिरोधों को दूर किया जाना भी जरूरी है . विभिन्न राज्यों में इस विषय पर हुई चर्चाओं, विधेयकों, सरकारी पत्राचार और निर्वाचन आयोग की सिफारिशों को एकत्र किये जाने की जरूरत है. इसके आधार पर एक तथ्यपरक साझा मांग-पत्र तैयार कर राज्य सरकार, केंद्र सरकार, संबंधित जनप्रतिनिधियों और निर्वाचन आयोग तक पहुँचाया जा सकता है.

साथ ही इस विषय पर संसद एवं विधान मंडल सदस्यों के साथ सार्वजनिक विमर्श में लगातार संवाद जरूरी है. शिक्षक संगठनों, शोधकर्ताओं और राजनीतिक संगठनों से हमारी गुजारिश है कि यदि उनके पास इस मुद्दे से संबंधित अन्य प्रमाण या दस्तावेज हैं, तो वे उन्हें जरूर प्रकाश में लाना चाहेंगे ताकि किसी तथ्य में त्रुटि होगी तो ये आगे जरूरी सुधार और किसी दावे का प्रमाण सहित खंडन के साथ इस विमर्श को मजबूत करेगा. हमारा उद्देश्य किसी विशेष दल अथवा संस्था विशेष पर आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि दस्तावेजों और तर्कों के आधार पर इस मुद्दे के समाधान तक पहुँचना है.

बीते विजयादशमी को बेगूसराय से प्रारंभिक शिक्षक साझा मंच के समन्वय समिति सदस्यों ने बिहार के प्रारंभिक शिक्षकों से इस मुद्दे पर विजय हासिल करने हेतु संकल्पित होने का आह्वान करते हुए कहा है कि बिहार के प्रारंभिक शिक्षकों के लिए यह अपने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सवाल को फिर से सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाने के लिए संकल्प लेने का अवसर है.

हमारी माँग स्पष्ट है विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में प्रारंभिक शिक्षकों की मतदाता-पात्रता /मताधिकार पर न्यायसंगत पुनर्विचार हो . इसके लिए आवश्यक संवैधानिक एवं विधायी पहल किया जाए. अब हमें व्यक्तिगत आवाजों को साझा संवाद में, संवाद को जनमत में और जनमत को संविधान के अनुच्छेद 171 (3) (सी) में अपेक्षित संशोधन की संसदीय कार्यवाही में बदलने का चरणबद्ध अभियान चलाना होगा.

दशकों से लंबित इस प्रश्न का समाधान केवल प्रारंभिक शिक्षकों का सरोकार नहीं है. यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, समानता और शिक्षकों की गरिमा से जुड़ा विषय है. आइए, इस अधूरे प्रश्न को आगे बढ़ाने के लिए संगठित, शांतिपूर्ण और संवैधानिक पहल करें.

तथ्य-संबंधी टिप्पणी: मूल आलेख में उल्लिखित शिक्षक-संबंधी आंकड़े यू-डायस प्लस से तथा संसदीय घटनाक्रम से जुड़ी जानकारियाँ पब्लिक डोमेन में उपलब्ध संसदीय अभिलेखों के आधार पर संकलित की गई हैं.

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