बिहार के 1,550 नौका घाटों से रोजाना चल रही 7,000 नावों को कौन पहनायेगा सुरक्षा का हेलमेट?
राघोपुर का नाव हादसा लापरवाहियों की मिसाल है. सरकार और समाज दोनों की लापरवाहियां. न लोगों में अपनी सुरक्षा की फिकर है, न सरकार जिसकी जिम्मेदारी नौवहन को सुरक्षित बनाना है, इन मामलों को लेकर गंभीर होती है. हर हादसे के बाद नावों के निबंधन, सुरक्षा इंतजाम, लाइफ जैकेट वगैरह के आदेश जारी होते हैं, मगर कुछ दिन बाद सरकार ही अपने उन आदेशों को भूल जाती है.
वैशाली के राघोपुर में 13 अक्टूबर की रात गंगा नदी में नाव पलटने से कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई है. मरने वालों में बारह बच्चे बताये जा रहे हैं. नाव पर सवार लोग रात 8.30 बजे नदी पार कर एक भोज में शामिल होने जा रहे थे. शुरुआती खबरों के मुताबिक नाव छोटी थी और क्षमता से अधिक लोग सवार थे. हादसे के बाद बचाव अभियान शुरू हुआ और सरकार ने मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने का ऐलान कर दिया. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बिहार में सुरक्षित नौका यात्रा को लेकर सजगता न लोगों में है, न सरकार में, ऐसा क्यों?
बिहार में जल परिवहन के देखरेख की जिम्मेदारी भी उसी परिवहन विभाग की है, जो इन दिनों सड़क सुरक्षा को लेकर बेहद सजग नजर आती है. मोटरसाइकिल सवार लोग बिना हेलमेट के दिख गये तो मुस्तैदी से चालान उनके फोन नंबर पर पहुंच जाता है. इसमें कोई बुराई नहीं है, मगर परिवहन विभाग ऐसी तत्परता जल परिवहन को लेकर बिल्कुल नहीं दिखाता. खास तौर पर इस लिहाज से कि बिहार में आज भी विभाग के ही आंकड़ों के मुताबिक 1550 घाटों से रोजाना 7000 से अधिक नावें चलती हैं और लाखों यात्री सफर करते हैं.
मगर लगातार दुर्घटना के बावजूद आप नावों पर सुरक्षा के इंतजाम कहीं नहीं पायेंगे. किसी जगह नावों के लिए लोड लाइन नहीं बनता कि इससे अधिक यात्री नावों पर नहीं बैठ सकते. नावों का रजिस्ट्रेशन भी होना है, मगर किसी की दिलचस्पी इसमें नहीं है. लाइफ जैकेट दुर्लभ चीज है. अभी फिर से भागलपुर में गंगा पार कराने के लिए बड़े-बड़े जहाज चल रहे हैं, इन जहाजों का परिचालन सरकार की तरफ से हो रहा है. आप किसी में यात्रियों के पास लाइफ जैकेट या डूबने से बचाने के उपकरण नहीं देखेंगे. सरकार घाटों से टैक्स लेती है, मगर वहां आपको किसी तरह की यात्री सुविधा नहीं दिखेगी. जो परिवहन विभाग सड़क सुरक्षा को लेकर इतना सजग है, वह जल परिवहन की सुरक्षा को लेकर इतना बेफिक्र कैसे रहता है, यह समझ से परे है.

150 घाटों पर बनने वाली है सामुदायिक जेटी
राज्य में अलग-अलग नदियों पर 1550 घाटों से सात हजार से अधिक नावों के परिचालन की लिखित सूचना इस साल जनवरी 2026 में मुझे इनलैंड वाटरवेज के पटना केंद्र से मिली थी. इसके अलावा राज्य के परिवहन विभाग ने जानकारी दी थी कि सरकार 150 अन्य घाटों पर सामुदायिक जेटी बनाने की योजना भी बना रही है. यानी नदियों के रास्ते आवागमन का दायरा बड़ा है और आने वाले दिनों में इसके विस्तार की संभावना भी है.
गंगा, गंडक, कोसी, घाघरा और दूसरी नदियों के बीच बसे दियारा इलाकों में नाव लोगों को बाजार, अस्पताल, स्कूल, खेत और दूसरे गांवों तक पहुंचाती है. कई जगह सड़क या पुल का विकल्प मौजूद नहीं है. कहीं पुल तक पहुंचने के लिए लंबा चक्कर लगाना पड़ता है, तो कहीं नदी के दूसरी तरफ जाने के लिए नाव ही सबसे व्यावहारिक साधन है.
इसलिए सवाल नावों का परिचालन बंद करने का नहीं, बल्कि इसे सुरक्षित बनाने का है. जब राज्य में हजारों नावें रोज यात्रियों को ढो रही हैं, तो उनकी सुरक्षा को भी परिवहन व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए.
पुल पहुंचा, लेकिन राघोपुर की नावें नहीं रुकीं
राघोपुर जहां यह हादसा हुआ है, इस समस्या को समझने का अच्छा उदाहरण है. हाल ही में पटना से राघोपुर तक पहुंचने के लिए छह लेन का पुल की शुरुआत हो गई है. मगर इससे यह नहीं समझना चाहिए कि राघोपुर के लोगों की नावों पर निर्भरता खत्म हो गई. प्रखंड के भीतर कई गांवों से बिदुपुर और दूसरी जगहों तक आने-जाने में अब भी नावों की जरूरत पड़ती है.
नवंबर 2025 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में मैंने राघोपुर के दस घाटों से नावों के परिचालन का जिक्र किया था, आठ गंगा के किनारे और दो गंडक की तरफ. जमींदारी घाट पर मोटर वाली नावों में यात्रियों के साथ मोटरसाइकिलें भी लादी जा रही थीं. नावों पर न लोड लाइन दिखाई दे रही थी, न यात्रियों के पास लाइफ जैकेट. उसी रिपोर्ट में पिछले साल नाव से गिरकर एक शिक्षक की मौत का भी जिक्र था.

हादसे पुराने हैं, सवाल भी पुराने हैं, मगर कोई नतीजा नहीं
बिहार में नाव दुर्घटनाओं का इतिहास बताता है कि राघोपुर की घटना कोई अकेली त्रासदी नहीं है. सितंबर 2009 में खगड़िया के फुलतौड़ा घाट के पास बागमती नदी में नाव पलटने से करीब 63 लोगों की मौत हुई थी. नाव पर क्षमता से अधिक लोगों के सवार होने और खराब मौसम की बात सामने आई थी. उस समय की रिपोर्टों ने यह सवाल उठाया था कि जब लोगों के पास आने-जाने का दूसरा साधन नहीं हो, तो वे जोखिम भरी नावों पर सफर करने को मजबूर होते हैं.
जनवरी 2017 में पटना में मकर संक्रांति के दौरान गंगा में नाव टूट जाने से 25 लोगों की मौत हुई थी. लोग गंगा दियारा में पतंगबाजी के आयोजन से लौट रहे थे.
अगस्त 2020 में खगड़िया और सहरसा में अलग-अलग नाव दुर्घटनाओं में कम से कम 12 लोगों की मौत हुई. इन घटनाओं में तेज हवा और तूफान के कारण नावों का संतुलन बिगड़ने की बात सामने आई थी.
मई 2026 में पटना और समस्तीपुर के बीच गंगा क्षेत्र में खेतों में काम करने जा रहे मजदूरों की नाव पलट गई. इस दुर्घटना में तीन लोगों की मौत हुई और चार लोग लापता बताए गए. शुरुआती जांच में नाव के इंजन में तकनीकी खराबी की आशंका जताई गई थी. इस हादसे के बाद पटना जिला प्रशासन ने बिना निबंधन वाली नावों के परिचालन पर सख्ती और नावों पर जरूरी जानकारी दर्ज करने जैसे कदमों की घोषणा की.
इन घटनाओं की वजहें एक जैसी नहीं थीं. कहीं ओवरलोडिंग की आशंका थी, कहीं खराब मौसम, तो कहीं तकनीकी खराबी. लेकिन इन सबमें एक साझा सवाल मौजूद है: क्या नावों के परिचालन से पहले उनकी क्षमता, हालत और सुरक्षा उपकरणों की नियमित जांच होती है? और अगर होती है, तो नियमों का उल्लंघन करने वाली नावों को यात्रियों के साथ नदी में उतरने कैसे दिया जाता है?
नियम हैं, लेकिन घाट पर उनका असर कहां है?
अगस्त 2024 में पटना के नासरीगंज घाट से दियारा के एक स्कूल में पढ़ाने जाने वाले शिक्षक अविनाश कुमार गंगा में गिर गए थे और उनकी मौत हो गई थी. उस समय घाट पर मौजूद नावों में लाइफ जैकेट और लोड लाइन जैसी सुरक्षा व्यवस्थाओं की कमी सामने आई थी. स्थानीय लोगों के मुताबिक, नासरीगंज घाट से रोज बड़ी संख्या में शिक्षक नावों से दियारा के स्कूलों में जाते थे. घटना के बाद प्रशासन ने नावों के निबंधन, यात्रियों के लिए लाइफ जैकेट, प्रशिक्षित गोताखोर और नाव की क्षमता निर्धारित करने जैसे निर्देश दिए थे.
यह उदाहरण बताता है कि हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय होता है और निर्देश जारी किए जाते हैं. मगर फिर सरकार खुद अपने निर्देशों को भूल जाती है.
मई 2026 में उमानाथ घाट के पास हुए हादसे के बाद पटना जिला प्रशासन ने नावों के निबंधन और उन पर जरूरी विवरण दर्ज करने को लेकर फिर सख्ती की बात कही. इससे सवाल उठता है कि अगर ऐसी व्यवस्थाएं पहले से जरूरी थीं, तो उन्हें हर घाट पर लगातार लागू क्यों नहीं कराया जा सका?

निगरानी किसकी जिम्मेदारी है?
नदी में चलने वाली नावों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक नाविक पर डालकर सरकार मुक्त नहीं हो सकती. परिवहन विभाग, जिला प्रशासन, घाटों के प्रबंधन और बंदोबस्ती से जुड़े निकायों तथा स्थानीय स्तर पर परिचालन नियंत्रित करने वाली व्यवस्था—सबकी भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए. किस अधिकारी को नावों का निबंधन जांचना है, कौन उनकी क्षमता और सुरक्षा उपकरणों का निरीक्षण करेगा, नियम तोड़ने पर किसकी जवाबदेही होगी और यात्रियों को शिकायत कहां करनी है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब जरूरी है.
सरकार को राज्य के सभी नौका घाटों और नावों का अद्यतन सार्वजनिक रिकॉर्ड तैयार करना चाहिए. उसमें नावों की संख्या, निबंधन की स्थिति, निर्धारित यात्री क्षमता, सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता और जिम्मेदार अधिकारी का विवरण हो. घाटों पर नियमित जांच हो और उसका रिकॉर्ड भी सार्वजनिक किया जाए। किसी हादसे के बाद जांच केवल दुर्घटना के कारणों तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी तय करे कि सुरक्षा नियमों के पालन में कहां चूक हुई.
राघोपुर में हुई मौतों के बाद राहत, मुआवजा और बचाव अभियान जरूरी हैं. लेकिन इनसे उन सवालों का जवाब नहीं मिलता, जो हादसे से पहले उठने चाहिए थे. क्या नाव निर्धारित क्षमता के भीतर यात्रियों को लेकर चल रही थी? क्या उसमें सुरक्षा उपकरण थे? क्या रात में परिचालन के लिए जरूरी इंतजाम मौजूद थे? और संबंधित अधिकारियों ने आखिरी बार उस घाट या नाव की जांच कब की थी?
अंग्रेजी हुकूमत में जल परिवहन यातायात के एक महत्वपूर्ण साधन थे। जिस प्रकार अभी पथ निर्माण विभाग के अंतर्गत कुछ-कुछ दूरी के लिए कार्यपालक अभियंता की तैनाती होती है, उसी प्रकार जल परिवहन के लिए अधिकारियों की तैनाती की जाती थी। उनके जिम्मे सारी व्यवस्था रहती थी। इतना ही नहीं, जल परिवहन में बाधक तत्वों की पहचान कर उसका समाधान भी किया जाता था। व्यवस्था सुधरने के बजाय बिगड़ती चली गई।
अच्छी जानकारी
सरकार में बैठे सफेदपोश ये मानबे नहीं करेंगे कि बिहार में कोई नाव से यात्रा करता है।