पैसे कमाकर नवरत्न बन गई IRCTC, हमारे हिस्से आया बेस किचेन का बासी खाना

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यह ममता बनर्जी ही थीं, जिनके रेलमंत्री रहते हुए 1999 में IRCTC(इंडियन रेलवे कैटरिन एंड टूरिज्म कारपोरेशन) की स्थापना हुई थी. मगर मगर 10 सालों में वे इसकी शिकायतों से इतनी परेशान हो गईं कि 2010 के बजट में उन्होंने इससे सारे अधिकार छीनकर जोनल रेलवे को दे दिये. वह व्यवस्था क्यों नहीं चली और क्यों फिर से IRCTC को सारे अधिकार देने पड़े, इसकी कहानी आगे.

IRCTC के बेस किचेन में तैयार होता खाना, यह खाना हमें अमूमन छह से आठ घंटे बाद मिलता है.

“कैटरिंग कोई तिजोरी भरने का धंधा नहीं है, बल्कि यह यात्रियों के लिये आवश्यक सेवा है. IRCTC का ध्यान सिर्फ कमाई बढ़ाने पर हो गया है.”

यह बयान ममता बनर्जी का है. उन्होंने 2010 में यह तब कहा था, जब वे रेलमंत्री थीं. यह ममता बनर्जी ही थीं, जिनके रेलमंत्री रहते हुए 1999 में IRCTC(इंडियन रेलवे कैटरिन एंड टूरिज्म कारपोरेशन) की स्थापना हुई थी. मगर मगर 10 सालों में वे इसकी शिकायतों से इतनी परेशान हो गईं कि 2010 के बजट में उन्होंने इससे सारे अधिकार छीनकर जोनल रेलवे को दे दिये. वह व्यवस्था क्यों नहीं चली और क्यों फिर से IRCTC को सारे अधिकार देने पड़े, इसकी कहानी आगे.

रेलवे के खान-पान पर लिखे पिछले पोस्ट में जब बड़ी संख्या में लोगों ने अपने अनुभव बताये तो मुझे लगा कि इस व्यवस्था के बारे में मुझे थोड़ा शोध करके विस्तार से लिखना चाहिए. ऐसे में जब शोध के दौरान मुझे ममता बनर्जी की यह सटीक उक्ति मिली.

1999 में IRCTC की शुरुआत सीमित अधिकारों के साथ हुई थी, मगर 2005 आते-आते इसे असीमित अधिकार दे दिये गये. जिसमें रेलवे के भोजन, आतिथ्य के साथ, ऑनलाइन टिकट बुकिंग की सेवा भी थी. मगर 2010 आते-आते इसकी व्यवस्था इतनी चरमरा गई कि संसद में रोज इसकी शिकायतें होने लगी थी. इन्हीं वजहों से ममता बनर्जी ने आजिज आकर यह फैसला लिया था.

दरअसल IRCTC की स्थापना रेलवे के खान-पान व्यवस्था की जिस अराजकता को खत्म करने के मकसद से हुई थी, वह उसे निभा पाने में पूरी तरह विफल रही. 1999 से पहले रेलवे में खान-पान की दो तरह की व्यवस्था थी. पहली रेल की अपनी व्यवस्था, जिसमें जोनल रेलवे द्वारा स्टेशनों पर अपने स्टाफ द्वारा कैंटीन चलाई जाती थी. दूसरी व्यवस्था में प्राइवेट वेंडर थे, जिन्हें खानदानी तौर पर स्टॉल मिलते थे. दोनों व्यवस्था की अपनी खामियां थीं. रेलवे के अपने स्टाफ परमानेंट थे और उन्हें सरकारी सेवकों जैसी सैलरी देनी पड़ती थी, स्थाई नौकरी की वजह से वे निश्चिंत थे. जबकि निजी वेंडर के काम का मूल्यांकन नहीं होता था.

मगर उस व्यवस्था की एक बड़ी खूबी थी, गरम और अच्छा खाना. IRCTC के आने के बाद रेलवे पर खर्चे का बोझ तो खत्म हो गया, मगर खाना गर्म और स्वादिष्ट मिले, यह सपना हो गया. यह सिर्फ ग्राहकों की अनुभूति नहीं है, कैग की रिपोर्ट से भी जाहिर है. 2017 में कैग ने 74 बड़े स्टेशनों और 80 रेलगाड़ियों की पड़ताल के बाद ऑन रिकार्ड लिखा था, भारतीय रेल में यात्रियों को परोसा जा रहा भोजन मानव उपभोग के लिये अयोग्य है. कैग ने पकड़ा की 22 ट्रेनों की पैंट्री कार में सीधे नल के अनफिल्टर्ड पानी से चाय, कॉफी और सूप बनाया जा रहा था. किचेन में कॉकरोच, चूहे और मक्खियां भिनभिना रही थीं और एक्सपायर्ड माल धड़ल्ले से खपाया जा रहा था.

यह सिर्फ उस साल की बात नहीं थी, 2023 से 2025 के बीच रेलवे के खान-पान को लेकर हर साल औसतन 6500 से 7000 शिकायतें मिलती रही हैं. इन आंकड़ों के साथ यह भी समझा जाना चाहिए कि अगर सौ लोगों को बुरा अनुभव होता है, तो उनमें से चार-पांच ही शिकायत करने का मन बना पाते हैं. ज्यादातर मन मारकर रह जाते हैं.

मगर 2017 की कैग रिपोर्ट के बाद जो हुआ, उसे समझना खास तौर पर जरूरी है. इस रिपोर्ट ने IRCTC की मौजूदा व्यवस्था पर एक बार फिर सवालिया निशान खड़े किये. और फिर जो सरकार ने फैसला किया वह और अधिक मारक साबित हुआ, जिसकी कीमत आज हम बेस्वाद भोजन के तौर पर चुका रहे हैं. उसके बाद सरकार ने पेंट्रीकार और रेलवे स्टेशनों पर खाना पकाने पर रोक लगा दी. IRCTC ने इसके लिए छह सौ से अधिक बेस किचन बनाये हैं. खाना वहीं पकता है और स्टेशनों पर पेंट्री में चढ़ाया जाता हैं. ऐसे में आपको और हमें छह से आठ घंटे पुराना पका खाना मिलता है. पेंट्री में उसे सिर्फ गर्म किया जाता है.

इसके अलावा इतने बड़े पैमाने पर खाना पकता है तो वहां एक ही कड़ाही में पाम ऑयल से एक ही तरह की ग्रैवी बनाई जाती है, पनीर से लेकर चिकेन तक में वही ग्रेवी इस्तेमाल होती है. इसलिए हर तरह की सब्जी एक रंग की दिखती है. ऐसे में स्वाद आये तो कहां से आये.

असल मसला यह है कि IRCTC की सोच अभी भी नहीं बदली. वह आज भी खुद को ढेर सारे पैसे कमाने वाले कारपोरेट में बदलना चाहता है. ग्राहकों की संतुष्टि उसके एजेंडे में नहीं. ऐसे में वह सबसे अधिक बोली लगाने वाले ठेकेदार को ठेका देता है. फिर वह खाना जैसा भी उपलब्ध कराये. इन सबका नतीजा यह निकला कि सिर्फ कैटरीन के ठेकों से इसकी सालाना आय 2000 करोड़ से अधिक हो गई है. 2008 में इसे मिनी रत्न का दर्जा मिला. 2019 में इसने खुद को शेयर बाजार में लिस्ट करा लिया. 2025 में इसे देश की 25वीं नवरत्न कंपनी का दर्जा मिला. यानी ममता बनर्जी की आशंका सही साबित हुई. IRCTC मुनाफा कमाने में बिजी रहा, यात्री बेहतर खाने के लिये तरसते रहे.

ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हर शिकायत के बाद सरकार ने व्यवस्था में बदलाव किये, जबकि जरूरत सुधार की थी. अगर शुरुआत में ही सरकारी कैंटीन और निजी वेंडरों की व्यवस्था में सुधार कर लिये जाते तो IRCTC की जरूरत नहीं पड़ती. 2010 में आजिज आकर ममता बनर्जी ने फिर से पुरानी व्यवस्था लागू करने की कोशिश की, मगर तब तक पुरानी व्यवस्था का इंफ्रास्ट्रक्चर ध्वस्त हो गया था, वह चला नहीं. 2017 में फिर से नई व्यवस्था लागू हुई. मगर कैग की रिपोर्ट के बाद पैंट्री कार की व्यवस्था सुधारने के बदले बेस किचेन की व्यवस्था लागू कर दी गई. अब हमारे हिस्से तो बेस किचेन का बासी और बेस्वाद खाना आयेगा ही.

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